मुख्य बिंदु: प्रतापगढ़ जिले (कांठल अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य प्राचीन नाम: कांठल प्रदेश (माही नदी के किनारे/कांठे पर स्थित होने के कारण), देवलिया (प्राचीन राजधानी)। उपनाम: कांठल का ताज, थेवा कला की नगरी, राजस्थान का 33वाँ जिला। स्थापना व पुनर्गठन: 1699 […]
प्रतापगढ़ जिले (कांठल अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
-
प्राचीन नाम: कांठल प्रदेश (माही नदी के किनारे/कांठे पर स्थित होने के कारण), देवलिया (प्राचीन राजधानी)।
-
उपनाम: कांठल का ताज, थेवा कला की नगरी, राजस्थान का 33वाँ जिला।
-
स्थापना व पुनर्गठन:
-
1699 ई. में महारावत प्रताप सिंह द्वारा ‘प्रतापगढ़’ नगर बसाया गया।
-
26 जनवरी 2008 को चित्तौड़गढ़ (अर्नोद, छोटी सादड़ी, प्रतापगढ़ तहसील), उदयपुर (धरियावद) और बांसवाड़ा (पीपलखूंट) के पुनर्गठन से परमेशचंद कमेटी की सिफारिश पर राजस्थान का 33वाँ स्वतंत्र जिला बनाया गया।
-
-
भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
-
प्रमुख नदियाँ: जाखम (उद्गम: छोटी सादड़ी की भंवरमाता पहाड़ी), माही (कांठल की गंगा), एराव, सिवना, करमोई।
-
जाखम बांध (अनुपपुरा गाँव): राजस्थान का सबसे ऊँचा बांध (81 मीटर); जनजातीय उपयोजना (TSP) के तहत निर्मित।
-
छप्पन का मैदान: प्रतापगढ़ और बांसवाड़ा के मध्य माही बेसिन का उपजाऊ भू-भाग।
-
2. राजवंश एवं प्रमुख शासक
-
राजवंश: सिसोदिया/गुहिल राजवंश (मेवाड़ के महाराणा कुंभा के भाई क्षेमसिंह के वंशज – देवलिया-प्रतापगढ़ शाखा)।
-
प्रमुख शासक व योगदान:
-
सूरजमल (16वीं सदी): इन्होंने देवलिया राज्य की नींव रखी।
-
रावत बाघ सिंह (देवलिया): चित्तौड़गढ़ के द्वितीय साके (1534-35 ई.) में गुजरात के बहादुरशाह के विरुद्ध सर्वोच्च बलिदान दिया और केसरिया का नेतृत्व किया (चित्तौड़ के पाडन पोल पर इनकी छतरी स्थित है)।
-
महारावत प्रताप सिंह (1673–1708 ई.): 1699 में प्रतापगढ़ नगर बसाया और इसे अपनी नई राजधानी बनाया।
-
महारावत सामंत सिंह: 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी से अधीनस्थ संधि की।
-
महारावत दलपत सिंह: 1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों के वफादार रहे।
-
महारावत रामसिंह: स्वतंत्रता एवं राजस्थान एकीकरण के समय प्रतापगढ़ के अंतिम शासक।
-
3. प्रमुख दुर्ग, मंदिर एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता / स्थल | प्रमुख विशेषता |
| देवलिया का राजमहल व किला | रावत सूरजमल / हरि सिंह | देवलिया (प्राचीन राजधानी) में स्थित ऐतिहासिक परकोटेदार महल। |
| भंवरमाता मंदिर (छोटी सादड़ी) | प्राचीन शक्तिपीठ | अरावली की पहाड़ियों में स्थित; जाखम नदी का उद्गम स्थल व सुरम्य प्राकृतिक जलप्रपात। |
| गौतमेश्वर महादेव (अरनोद, मंदाकिनी कुंड) | पौराणिक तीर्थ स्थल | इसे ‘कांठल का हरिद्वार’ कहा जाता है; आदिवासियों का मुक्ति धाम। यहाँ स्नान करने पर ‘पाप मुक्ति प्रमाण पत्र’ जारी होने की ऐतिहासिक परंपरा रही है। |
| दीपनाथ महादेव मंदिर | महारावत दीपसिंह | प्रतापगढ़ नगर के मध्य स्थित ऐतिहासिक प्राचीन शिवालय। |
| काकाजी की दरगाह (दरगाह शरीफ) | सूफी संत सैयदी काका साहब | दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय का पवित्र तीर्थ; इसे ‘कांठल का ताजमहल’ कहा जाता है। |
4. सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य (Sitamata Sanctuary)
-
विस्तार: प्रतापगढ़ व चित्तौड़गढ़ सीमा पर स्थित समृद्ध जैव-विविधता केंद्र (1979 में अधिसूचित)।
-
प्रमुख विशेषताएँ:
-
उड़न गिलहरी (Flying Squirrel): महुआ के वृक्षों पर रहने वाली ‘रेड जायंट फ्लाइंग स्क्विरेल’ का भारत में प्रमुख प्राकृतिक वास (स्थानीय नाम: ‘आसोवा’)।
-
चौसिंगा (Four-horned Antelope): स्थानीय भाषा में इसे ‘घोटेल’ या ‘भेंडल’ कहा जाता है; यह विश्व में सर्वाधिक इसी अभयारण्य में पाया जाता है।
-
औषधीय पादप: हिमालय के बाद भारत में सर्वाधिक प्राकृतिक औषधियाँ सीतामाता अभयारण्य में पाई जाती हैं।
-
पौराणिक संदर्भ: महर्षि वाल्मीकि का आश्रम, ‘लव-कुश कुंड’ (ठंडे व गर्म पानी के प्राकृतिक झरने) यहीं स्थित हैं।
-
5. कला, संस्कृति एवं हस्तशिल्प — विश्व प्रसिद्ध ‘थेवा कला’
-
थेवा कला (Thewa Craft):
-
परिभाषा: हरे रंग के बेल्जियम कांच (Colored Glass) पर सोने की अत्यंत बारीक व उत्कृष्ट नक्काशी/तारकशी करने की अनूठी आभूषण कला।
-
प्रवर्तक: नाथूजी सोनी (मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने इस राजपरिवार को ‘राजसोनी’ की उपाधि दी थी)।
-
विशेषता: यह एक गुप्त पारिवारिक कला है, जो केवल परिवार के पुत्रों को सिखाई जाती है (बेटियों को भी नहीं सिखाई जाती)।
-
प्रमुख कलाकार: पद्मश्री महेश राजसोनी, रामप्रसाद राजसोनी, गिरीश कुमार।
-
भारत सरकार द्वारा थेवा कला पर डाक टिकट जारी किया गया है और इसे जीआई (GI) टैग प्राप्त है।
-
6. जनजाति एवं लोक संस्कृति
-
मीणा व भील जनजाति की प्रधानता:
-
प्रतापगढ़ के धरियावद और पीपलखूंट क्षेत्र में भील व मीणा जनजातियों का सघन वास।
-
पारंपरिक लोक नृत्य: गैर नृत्य, नेजा नृत्य, घूमरा नृत्य।
-
-
छोटी सादड़ी (राजस्थान का स्वर्ण/अफीम व्यापार केंद्र):
-
अफीम (काला सोना / Black Gold) की खेती और व्यापार का प्रमुख केंद्र।
-
7. स्वतंत्रता संग्राम, प्रजामंडल एवं एकीकरण
-
प्रतापगढ़ प्रजामंडल (1945 ई.):
-
संस्थापक: अमृतलाल पायक एवं चुन्नीलाल प्रभाकर।
-
इन्होंने रियासती शासन के अत्याचारों, बेगार प्रथा और अस्पृश्यता के विरुद्ध व्यापक जनजागृति अभियान चलाया।
-
-
राजस्थान एकीकरण (25 मार्च 1948):
-
द्वितीय चरण (पूर्व राजस्थान संघ) में प्रतापगढ़ रियासत का राजस्थान में पूर्ण विलय हुआ।
-