मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य मारवाड़ (प्राचीन नाम: मरुकांतार / मरुदेश / मरुवार) पश्चिमी राजस्थान की सबसे विस्तृत और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रियासत रही है। यहाँ राठौड़ राजवंश ने शासन किया। इतिहासकारों एवं ख्यातों के अनुसार राठौड़ों को कन्नौज के गहड़वालों का वंशज (राष्ट्रकूट) माना जाता है। संस्थापक (आदिपुरुष / मूलपुरुष): राव सीहा […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
मारवाड़ (प्राचीन नाम: मरुकांतार / मरुदेश / मरुवार) पश्चिमी राजस्थान की सबसे विस्तृत और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रियासत रही है। यहाँ राठौड़ राजवंश ने शासन किया। इतिहासकारों एवं ख्यातों के अनुसार राठौड़ों को कन्नौज के गहड़वालों का वंशज (राष्ट्रकूट) माना जाता है।
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संस्थापक (आदिपुरुष / मूलपुरुष): राव सीहा (1273 ई.) — कन्नौज से आकर पाली के निकट खेड़/पाली (लाखा झंवर) को केंद्र बनाया। इनकी छतरी/स्मारक बीठू गाँव (पाली) में स्थित है।
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सामंती प्रथा व राजधानी विस्तार:
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राव धूहड़: कर्नाटक से कुलदेवी नागणेची माता (चक्रेश्वरी) की काष्ठ प्रतिमा लाकर नागाणा गाँव (बाड़मेर) में स्थापित करवाई।
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राव चूड़ा (1394–1423 ई.): इंदा प्रतिहारों से दहेज में मंडोर प्राप्त किया और मंडोर को मारवाड़ की स्थायी राजधानी बनाया। मारवाड़ में विधिवत सामंतवादी प्रथा (Feudal System) के वास्तविक जनक।
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जोधपुर की स्थापना: राव जोधा ने 12 मई, 1459 ई. को चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ दुर्ग (मयूरध्वजगढ़) की नींव रखी और जोधपुर नगर बसाकर राजधानी बनाया।
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प्रमुख शासक एवं ऐतिहासिक मील के पत्थर:
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राव मालदेव (1531–1562 ई.): 52 युद्धों और 58 परगनों के विजेता। फारसी इतिहासकारों (फ़रिश्ता, बदायूँनी) ने इन्हें ‘हशमत वाला राजा’ (वैभवशाली शासक) कहा।
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गिरी-सुमेल (जैतारण) का युद्ध (जनवरी 1544 ई.): शेरशाह सूरी के विरुद्ध; मालदेव के प्रसिद्ध सेनापति जेता और कूँपा के अद्भुत शौर्य पर शेरशाह ने कहा था— “मैंने मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की सल्तनत खो दी होती।”
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रानी उमादे (रूठी रानी): जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री, जो आजीवन तारागढ़ (अजमेर) में रूठकर रही।
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राव चंद्रसेन (1562–1581 ई.): ‘मारवाड़ का प्रताप’, ‘प्रताप का अग्रगामी/पथ-प्रदर्शक’, तथा ‘भूला-बिसरा राजा’ (The Forgotten Hero)। 1570 ई. के नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और आजीवन भाद्राजून व सिवाना (बाड़मेर) की पहाड़ियों से छापामार संघर्ष किया।
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मोटा राजा उदयसिंह (1583–1595 ई.): मुग़लों की अधीनता स्वीकार करने तथा वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाले मारवाड़ के प्रथम शासक। अपनी पुत्री मानबाई (जोधबाई / जगत गोसाईं) का विवाह जहाँगीर (सलीम) से किया (शाहजहाँ की माता)।
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महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638–1678 ई.): धर्मत के युद्ध (1658 ई.) में औरंगजेब के विरुद्ध दारा शिकोह का साथ दिया। इनकी मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था— “आज कुफ़्र (धर्म-विरोध) का दरवाज़ा टूट गया।”
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वीर दुर्गादास राठौड़ (मारवाड़ का अणबिंदिया मोती / गैरीबाल्डी): जसवंत सिंह के अल्पवयस्क पुत्र अजीत सिंह को औरंगजेब के चंगुल से छुड़ाकर 30 वर्षों तक अनवरत संघर्ष (राठौड़-मुग़ल संघर्ष 1679–1707 ई.) किया और मारवाड़ की गद्दी पर बैठाया।
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2. प्रमुख रचनाएँ, साहित्य और रचनाकार
मारवाड़ रियासत की साहित्यिक परंपरा मुख्यतः डिंगल (चारणी भाषा) और संस्कृत-बृज मिश्रित दरबारी साहित्य में समृद्ध रही है:
| रचना (Work) | रचनाकार (Author) | भाषा / प्रकार | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| मारवाड़ रा परगना री विगत एवं नैणसी री ख्यात | मुहणौत नैणसी (जसवंत सिंह प्रथम के दीवान) | डिंगल / राजस्थानी गद्य | ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ को ‘राजस्थान का गजेटियर’ कहा जाता है (सर्वप्रथम जनगणना के आंकड़े प्रस्तुत किए)। मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को ‘राजपूताने का अबुल फज़ल’ कहा। |
| आनंद विलास, भाषा भूषण, प्रबोध चंद्रोदय, अपरोक्ष सिद्धांत सार | महाराजा जसवंत सिंह प्रथम | बृजभाषा / संस्कृत (काव्यशास्त्र) | ‘भाषा भूषण’ हिंदी साहित्य में अलंकारों का अत्यंत प्रसिद्ध एवं मानक लक्षण-ग्रंथ है (212 दोहे)। |
| राठौड़ रूपक माहे / गुणरूपक | कवि केशवदास गाडण | डिंगल | महाराजा गजसिंह के शासनकाल और सैन्य शौर्य का ऐतिहासिक विवरण। |
| बांकीदास री ख्यात, आयो इंगरेज मुलक रे ऊपर, दातार बावनी | कविराजा बांकीदास आसिया (महाराजा मानसिंह के दरबारी) | डिंगल | ‘आयो इंगरेज मुलक रे ऊपर’ 1857 से पूर्व रचित प्रसिद्ध राष्ट्रीय चेतना व स्वाधीनता का गीत है। |
| नाथ चरित, जालंधर चरित, मानचरित | महाराजा मानसिंह (जोधपुर) | डिंगल / हिंदी | महाराजा मानसिंह ‘नाथ संप्रदाय’ के अनन्य अनुयायी थे। इन्होंने जोधपुर में ‘महामंदिर’ का निर्माण करवाया और नाथ साहित्य का सृजन किया। |
| सूरज प्रकाश | कवि करणीदान | डिंगल | महाराजा अभयसिंह के शासनकाल और अहमदाबाद विजय का सविस्तार वर्णन। |
| राज रूपक | वीरभाण रत्नू | डिंगल | अभयसिंह और सरबुलंद खाँ के मध्य अहमदाबाद युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी काव्यात्मक चित्रण। |
| अजीत चरित्र / दुर्गादास चरित | पं. जगजीवन भट्ट | संस्कृत महाकाव्य | अजीत सिंह और वीर दुर्गादास राठौड़ के 30 वर्षीय मुग़ल संघर्ष का ऐतिहासिक साक्ष्य। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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डिंगल भाषा का केंद्र: राजस्थान का प्रामाणिक चारण साहित्य (वीर रस, नीति, फुटकर छंद) मारवाड़ की मरुभाषा (डिंगल) में ही सर्वाधिक फला-फूला।
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चित्रकला की जोधपुर (मारवाड़) शैली:
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विकास: मालदेव के काल से स्वतंत्र रूप (चोखेलाव महल के भित्ति चित्र — राम-रावण युद्ध)।
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स्वर्णकाल: महाराजा मानसिंह का काल (नाथ संप्रदाय से जुड़े चित्रों की प्रधानता — ‘ढोला मारू’, ‘मूमल-महेंद्रा’, ‘नाथ चरित’)।
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विशेषताएँ: पीले रंग की प्रधानता, बादलों की घुमावदार आकृतियाँ, खंजन पक्षी जैसी आँखें और मूंछों वाले ओजस्वी पुरुष।
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नाथ संप्रदाय का उत्कर्ष: 19वीं सदी के आरंभ में महाराजा मानसिंह के समय जोधपुर नाथ पंथ (आयस देवनाथ के आशीर्वाद से) का सबसे बड़ा केंद्र बना और ‘महामंदिर’ (84 खंभों का मंदिर) की स्थापना हुई।
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राठौड़-मुग़ल 30 वर्षीय संघर्ष (1679–1707 ई.): दुर्गादास राठौड़ के नेतृत्व में मारवाड़ का जन-आंदोलन राजपूत स्वाभिमान और मुग़ल सत्ता के प्रतिरोध का बेजोड़ उदाहरण बना।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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मारवाड़ में राठौड़ वंश का संस्थापक: राव सीहा (1273 ई.)।
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सामंत प्रथा के जनक व मंडोर को राजधानी बनाने वाले: राव चूड़ा।
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जोधपुर नगर एवं मेहरानगढ़ की स्थापना: राव जोधा (12 मई, 1459)।
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‘हशमत वाला राजा’: राव मालदेव (गिरी-सुमेल युद्ध 1544 — सेनापति: जेता और कूँपा)।
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‘मारवाड़ का प्रताप’ / ‘भूला-बिसरा राजा’: राव चंद्रसेन (1570 नागौर दरबार विरोधी)।
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‘राजपूताने का अबुल फज़ल’: मुहणौत नैणसी (उपाधि प्रदाता: मुंशी देवीप्रसाद)।
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‘मारवाड़ का अणबिंदिया मोती’: वीर दुर्गादास राठौड़ (छतरी: उज्जैन, क्षिप्रा नदी तट)।
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‘भाषा भूषण’ अलंकार ग्रंथ के रचयिता: महाराजा जसवंत सिंह प्रथम।