मुख्य बिंदु: 1. स्थानीय स्वशासन: अर्थ, महत्व और पृष्ठभूमि परिभाषा व उद्देश्य: स्थानीय स्तर के विकास में स्थानीय व्यक्तियों की सहभागिता बढ़ाने और लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण को सशक्त करने के लिए स्थानीय स्वशासन संस्थाएं स्थापित की गई हैं। इसके अंतर्गत शासन का संचालन जनता द्वारा चुनी गई संस्थाओं द्वारा किया जाता है, जो केन्द्रीय या राज्य शासन के […]
1. स्थानीय स्वशासन: अर्थ, महत्व और पृष्ठभूमि
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परिभाषा व उद्देश्य: स्थानीय स्तर के विकास में स्थानीय व्यक्तियों की सहभागिता बढ़ाने और लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण को सशक्त करने के लिए स्थानीय स्वशासन संस्थाएं स्थापित की गई हैं। इसके अंतर्गत शासन का संचालन जनता द्वारा चुनी गई संस्थाओं द्वारा किया जाता है, जो केन्द्रीय या राज्य शासन के नियंत्रण में रहकर नागरिकों की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं।
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संवैधानिक दर्जा: वर्ष 1992 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा इन्हें संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
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विभिन्न देशों में नाम: भारत में इसे ‘स्थानीय स्वशासन’, फ्रांस में ‘स्थानीय प्रशासन (प्रीफेक्ट व्यवस्था)’ तथा अमेरिका में ‘म्युनिसिपल शासन’ कहा जाता है।
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प्राचीन भारत में परंपरा:
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वैदिक युग: ऋग्वेद में ‘सभा’ एवं ‘समिति’ नामक संस्थाओं का उल्लेख है जो राजा पर नियंत्रण रखती थीं। महाभारत के शांति पर्व के अनुसार ग्राम सबसे छोटी इकाई थी, जिसका प्रबंधन ‘ग्रामिक’ नामक अधिकारी करता था।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र: कौटिल्य ने जनपद प्रशासन को ग्राम, संग्रहण (10 गाँव), कार्वाटिक (200 गाँव), द्रोणमुख (400 गाँव) व स्थानीय (800 गाँव) में विभक्त किया था।
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चोल शासन: दक्षिण भारत में स्थानीय स्वशासन का सबसे बेहतरीन उदाहरण चोल शासन के दौरान ‘नाडु परिषदों’ के रूप में देखने को मिलता है।
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2. राजस्थान में स्थानीय स्वशासन का विकास
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रियासतों में प्रयास: आधुनिक राजस्थान के गठन से पूर्व बीकानेर (1929), जयपुर (1938), सिरोही (1943), भरतपुर (1944) व करौली (1949) में पंचायती राज कानून बनाए गए थे।
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ऐतिहासिक शुरुआत: राजस्थान पंचायती राज की स्थापना में अग्रणी राज्य रहा है।
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प्रथम शुभारंभ: 2 अक्टूबर 1959 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले से त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का शुभारंभ किया। इस प्रकार देश में त्रि-स्तरीय पंचायती राज लागू करने वाला राजस्थान प्रथम राज्य बना।
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प्रमुख समितियाँ: हरिश्चंद्र माथुर समिति (1963), सादिक अली समिति (1963), गिरधारीलाल व्यास समिति (1975), हरलालसिंह खर्रा समिति (1990), अरुण कुमार समिति (1996), शिवचरण माथुर आयोग (2000) एवं गुलाबचंद कटारिया मंत्रिमंडलीय उप समिति (2004-05)।
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वर्तमान अधिनियम: 73वें व 74वें संशोधन के अनुसरण में राजस्थान में राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 तथा वर्तमान में नगरीय स्थानीय स्वशासन के लिए राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 लागू है।
3. ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज – त्रि-स्तरीय संरचना)
(अ) ग्राम सभा
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यह प्रत्यक्ष प्रजातंत्र की अवधारणा को साकार करने वाली संस्था है।
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ग्राम पंचायत क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज 18 वर्ष की आयु प्राप्त प्रत्येक नागरिक इसका सदस्य होता है।
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इसकी वर्ष में कम से कम दो बैठकें (पहली वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में और दूसरी अंतिम तिमाही में) होना अनिवार्य है।
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बैठक की गणपूर्ति (Quorum) कुल सदस्यों का दसवाँ हिस्सा (1/10) होती है।
(ब) ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर)
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तीन हजार तक की जनसंख्या वाली पंचायत में एक सरपंच और 9 वार्ड पंच होते हैं; तीन हजार से अधिक जनसंख्या पर प्रत्येक अतिरिक्त एक हजार या उसके अंश पर 2 वार्ड पंच बढ़ते हैं।
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पंच व सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए। कार्यकाल 5 वर्ष है।
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महिलाओं के लिए स्थान वर्गवार 50 प्रतिशत आरक्षित हैं।
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सरपंच और उपसरपंच को पद ग्रहण के दो वर्ष बाद 3/4 (तीन-चौथाई) बहुमत से पारित अविश्वास प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।
(स) पंचायत समिति (ब्लॉक / मध्यवर्ती स्तर)
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राजस्थान में वर्तमान में 295 पंचायत समितियाँ (नवीनतम रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग 457) कार्यशील हैं।
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गठन: प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्य, उस क्षेत्र के सभी विधानसभा सदस्य, और सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच इसके सदस्य होते हैं।
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निर्वाचित प्रतिनिधि अपने में से प्रधान व उपप्रधान चुनते हैं। इन्हें भी 3/4 बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।
(द) जिला परिषद (जिला स्तर – सर्वोच्च इकाई)
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ग्रामीण विकास की योजनाओं के निष्पादन में पर्यवेक्षकीय भूमिका निभाती है तथा ग्राम पंचायत/पंचायत समिति और राज्य सरकार के बीच कड़ी का काम करती है।
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गठन: प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचित सदस्य, लोकसभा/विधानसभा सदस्य, राज्यसभा सदस्य और सभी पंचायत समितियों के प्रधान इसके सदस्य होते हैं।
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निर्वाचित सदस्य अपने में से जिला प्रमुख व उपजिला प्रमुख का चुनाव करते हैं।
4. नगरीय स्थानीय स्वशासन
74वें संविधान संशोधन (1992) के तहत नगरीय निकायों को संवैधानिक दर्जा मिला। राजस्थान में वर्तमान में 7 नगर निगम, 34 नगर परिषद और 146 नगरपालिकाएं हैं।
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नगर निगम (शीर्ष निकाय):
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5 लाख से अधिक जनसंख्या वाले वृहत्तर नगरीय क्षेत्रों में स्थापित।
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राजस्थान के सभी 7 संभाग मुख्यालयों (जयपुर, जोधपुर, कोटा, अजमेर, बीकानेर, उदयपुर, भरतपुर) में नगर निगम गठित हैं।
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अध्यक्ष ‘महापौर’ और उपाध्यक्ष ‘उपमहापौर’ कहलाते हैं।
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नगर परिषद:
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1 लाख से 5 लाख तक की जनसंख्या वाले लघुत्तर नगरीय क्षेत्रों में गठित (वर्तमान में 47 (कुछ स्रोतों और रिपोर्ट्स के अनुसार 51))।
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अध्यक्ष ‘सभापति’ और उपाध्यक्ष ‘उपसभापति’ कहलाते हैं।
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नगरपालिका:
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1 लाख से कम जनसंख्या वाले छोटे संक्रमणकालीन नगरीय क्षेत्रों में नगरपालिका बोर्ड का गठन किया जाता है (वर्तमान में कुल 146)।
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अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का निर्वाचन पार्षदों द्वारा किया जाता है।
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छावनी बोर्ड (Cantonment Board):
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सैनिकों के निवास क्षेत्रों के लिए 1924 अधिनियम के तहत गठित, जो सीधे रक्षा मंत्रालय से प्रशासित होते हैं।
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राजस्थान में नसीराबाद (अजमेर) में एकमात्र छावनी बोर्ड है।
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5. राजस्थान में स्थानीय स्वशासन से जुड़े उल्लेखनीय विशेष प्रावधान व प्रयास
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शैक्षणिक योग्यता: चुनाव लड़ने वाले अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता तय की गई है—
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जिला परिषद एवं पंचायत समिति सदस्य: 10वीं कक्षा उत्तीर्ण
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अनुसूचित क्षेत्र के सरपंच: 5वीं कक्षा उत्तीर्ण
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अन्य पंचायत के सरपंच: 8वीं कक्षा उत्तीर्ण
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शौचालय अनिवार्यता: पंचायत व निकाय चुनाव लड़ने वाले अभ्यर्थियों के घर में कार्यशील शौचालय होना अनिवार्य किया गया है।
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संतान संबंधी नियम: चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है।
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अपराधियों पर रोक: न्यायालय द्वारा 5 वर्ष या अधिक कारावास से दण्डनीय अपराध का संज्ञान व आरोप विचारित होने पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध।
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वार्ड सभा: ग्रामीण विकास योजनाओं में सहभागिता बढ़ाने हेतु वार्ड सभा का गठन किया गया है।