मुख्य बिंदु: झालावाड़ जिले (हाड़ौती अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य उपनाम: राजस्थान का नागपुर (संतरा उत्पादन के कारण), घंटियों का शहर (झालरापाटन – City of Bells), विरासत नगरी, राजस्थान का चेहरा। स्थापना व निर्माण: 1796 ई. में कोटा के दीवान झाला जालिम […]
झालावाड़ जिले (हाड़ौती अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
- उपनाम: राजस्थान का नागपुर (संतरा उत्पादन के कारण), घंटियों का शहर (झालरापाटन – City of Bells), विरासत नगरी, राजस्थान का चेहरा।
- स्थापना व निर्माण:
- 1796 ई. में कोटा के दीवान झाला जालिम सिंह द्वारा ‘छावनी’ (झालरापाटन) बसाई गई।
- 1838 ई. में अंग्रेजों ने कोटा रियासत से अलग कर झाला मदनसिंह को झालावाड़ का पहला स्वतंत्र शासक बनाया (राजस्थान की सबसे नवीनतम व अंग्रेजों द्वारा निर्मित एकमात्र रियासत)।
- भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
- जलवायु/वर्षा: राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा वाला जिला (औसत वर्षा: ~100 सेमी; सर्वाधिक आर्द्र जिला)।
- प्रमुख नदियाँ: कालीसिंध, आहू, चंद्रभागा, परवन, पीपलाज, चंवली, उजाड़।
- डग व गंगधार प्रदेश: मालवा के पठार का विस्तार; काली उपजाऊ मिट्टी (हड़ौती का पठार)।
- प्रमुख बांध: गागरिन बांध, भीमसागर बांध (उजाड़ नदी पर), चंवली बांध, पीपलाज बांध।
2. राजवंश एवं प्रमुख शासक
- राजवंश: झाला राजवंश (मूलतः काठियावाड़, गुजरात के हलवद से संबंधित)।
- प्रमुख शासक व योगदान:
- झाला जालिम सिंह: कोटा के प्रसिद्ध दीवान व कूटनीतिज्ञ; इन्होंने 1817 की संधि में अंग्रेजों से अपने परिवार के लिए अलग रियासत की शर्त रखी थी।
- झाला मदनसिंह (1838 ई.): झालावाड़ रियासत के प्रथम स्वतंत्र शासक।
- महाराणा पृथ्वीसिंह: 1857 की क्रांति के समय शासक; तांत्या टोपे ने झालावाड़ पर आक्रमण कर पृथ्वीसिंह से 5 लाख रुपए वसूले थे।
- महाराजा भवानी सिंह (1899–1922 ई.): कला, साहित्य व रंगमंच के महान संरक्षक; ओपेरा शैली में प्रसिद्ध ‘भवानी नाट्यशाला’ का निर्माण कराया।
- महाराजा हरिश्चंद्र: स्वतंत्रता के समय झालावाड़ के अंतिम शासक; राजस्थान के एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
- कोलवी, विनायका एवं हाथीगोड़ की बौद्ध गुफाएं (डग):
- 5वीं से 7वीं शताब्दी की बौद्ध हीनयान शाखा की शैलकृत गुफाएं (Rock-cut Buddhist Caves)।
- इसे ‘राजस्थान की अजंता-एलोरा’ कहा जाता है।
- चंद्रावती नगरी (झालरापाटन): चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित 6ठी-7वीं शताब्दी का प्राचीन नगर, जहाँ से प्रतिहार और गुप्तोत्तर कालीन मूर्तियां व मंदिर प्राप्त हुए।
4. प्रमुख दुर्ग, महल एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| गागरोन दुर्ग | डोड (परमार) राजा बीजलदेव (12वीं सदी) | आहू और कालीसिंध नदियों के संगम (सामेल जी) पर स्थित राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ जल दुर्ग (ओदक दुर्ग)। यह बिना किसी नींव के एक विशाल प्राकृतिक चट्टान पर खड़ा है। यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल (2013)। इसमें सूफी संत हमीदुद्दीन (मीठे शाह) की दरगाह और संत पीपा की समाधि स्थित है। |
| गढ़ पैलेस (झालावाड़ सिटी पैलेस) | झाला मदनसिंह (1840 ई.) | शहर के मध्य स्थित भव्य राजमहल; इसमें बने शीश महल और काष्ठ-चित्रण अपने उत्कृष्ट भित्तिचित्रों हेतु प्रसिद्ध हैं। |
| भवानी नाट्यशाला | महाराजा भवानी सिंह (1921 ई.) | यूरोपीय ओपेरा शैली (Opera Style) में निर्मित उत्तर भारत की एकमात्र पारसी रंगमंच नाट्यशाला; इसमें भूमिगत मंच व रथों को सीधे मंच पर लाने की व्यवस्था है। |
| शीतलेश्वर महादेव मंदिर (झालरापाटन) | सामंत वोप्पक (689 ई.) | चंद्रभागा नदी तट पर स्थित राजस्थान का प्रथम तिथि-अंकित मंदिर (689 ई./संवत 746)। यह महा-मारू शैली का उत्कृष्ट शिवालय है। |
| सूर्य मंदिर / पद्मनाभ मंदिर (झालरापाटन) | नागभट्ट द्वितीय / प्रतिहार काल | इसे ‘सात सहेलियों का मंदिर’ या ‘चारभुजा मंदिर’ भी कहा जाता है। कर्नल जेम्स टॉड ने इसे ‘चारभुजा मंदिर’ कहा था। कोणार्क शैली के रथ के आकार का शिखर और भगवान सूर्य की घुटनों तक जूते पहने प्रतिमा। |
| मनोहरथाना दुर्ग | परमार/हाड़ा शासक | परवन और कालीखाड़ नदियों के संगम पर स्थित सामरिक जल दुर्ग। |
| काठ का रैन बसेरा | वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून (1936) | किशन सागर झील के किनारे लकड़ी से निर्मित कलात्मक कॉटेज (महाराजा राजेंद्र सिंह इसे लखनऊ प्रदर्शनी से खरीदकर लाए थे)। |
5. गागरोन दुर्ग के ऐतिहासिक दो साके (2 Sakas)
- प्रथम साका (1423 ई.):
- आक्रमणकारी: मालवा का सुल्तान होशंगशाह (अल्प खां)।
- शासक: खींची चौहान शासक अचलदास खींची।
- अचलदास खींची लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और रानी उमादे (मेवाड़ के महाराणा मोकल की बहन) के नेतृत्व में महिलाओं ने जौहर किया। (इसका सजीव वर्णन शिवदास गाडण के ग्रंथ में है)।
- द्वितीय साका (1444 ई.):
- आक्रमणकारी: मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम।
- शासक: अचलदास के पुत्र पालणसिंह।
- महमूद खिलजी ने दुर्ग जीतकर इसका नाम ‘मुस्तफाबाद’ रखा।
6. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं सूफी परंपरा
- भक्त संत पीपा जी महाराज:
- गागरोन के खींची चौहान शासक (मूल नाम: प्रताप सिंह खींची)।
- राजपाट त्यागकर रामानंद जी के शिष्य बने; राजस्थान में भक्ति आंदोलन की अलख जगाने वाले प्रथम संत।
- दर्जी समुदाय के आराध्य देव; गागरोन दुर्ग में इनकी ‘छतरी’, समदड़ी (बाड़मेर) में मुख्य ‘मंदिर’ और टोडा (टोंक) में इनकी ‘गुफा’ स्थित है।
- सूफी संत मीठे शाह की दरगाह:
- हजरत ख्वाजा हमीदुद्दीन चिश्ती (मीठे शाह); गागरोन दुर्ग परिसर में स्थित है (निर्माण: मुग़ल सम्राट औरंगजेब द्वारा)। प्रतिवर्ष मुहर्रम के माह में विशाल उर्स लगता है।
- चंद्रभागा कार्तिक मेला (झालरापाटन):
- कार्तिक पूर्णिमा को चंद्रभागा नदी में पवित्र स्नान व दीपदान परंपरा।
- मालवी नस्ल के पशुओं (बैल व गायों) के व्यापार हेतु प्रसिद्ध राज्य स्तरीय पशु मेला।
7. कला, संस्कृति एवं हस्तशिल्प
- झालावाड़ चित्रकला शैली:
- कोटा, बूंदी व मालवा चित्रशैली का प्रभाव।
- विषय: कृष्ण लीला, बारहमासा, शिकार के दृश्य और महलों में राधा-कृष्ण की रासलीला के भित्तिचित्र।
- बिंदौरी नृत्य (Bindori Dance):
- झालावाड़ अंचल का अत्यंत लोकप्रिय गैर-शैली का लोक नृत्य; विवाह और होली के अवसर पर पुरुषों द्वारा ढोल व थाली की थाप पर किया जाता है।
- ढोलक व नगाड़ा वादन: हाड़ौती लोक संस्कृति का पारंपरिक वाद्य।
- कृषि संपदा व संतरा उत्पादन:
- उत्तम गुणवत्ता के संतरों (नागपुरी संतरा) व अफीम (काला सोना) उत्पादन के लिए प्रसिद्ध। भवानीमंडी में संतरा अनुसंधान केंद्र स्थित है।
8. प्रमुख साहित्यकार एवं विद्वान
- शिवदास गाडण: अचलदास खींची के दरबारी चारण कवि; प्रसिद्ध डिंगल ग्रंथ ‘अचलदास खींची री वचनिका’ के रचयिता (जिसमें 1423 के गागरोन साके का आंखों देखा वर्णन है)।
- कवि मतिराम व भूषण के समकालीन कवि: हाड़ा व झाला दरबारों में आश्रय प्राप्त विद्वान।
9. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रजामंडल आंदोलन
- झालावाड़ प्रजामंडल (1946 ई.):
- स्थापना: 25 नवंबर 1946 को मांगीलाल भव्य (अध्यक्ष), कन्हैयालाल मित्तल और मकबूल आलम द्वारा की गई।
- विशेषता: राजस्थान का एकमात्र प्रजामंडल जिसे स्थानीय शासक (महाराजा हरिश्चंद्र) का पूरा संरक्षण व समर्थन प्राप्त था।
- उत्तरदायी शासन की स्थापना (1947):
- झालावाड़ के महाराजा हरिश्चंद्र ने स्वेच्छा से राज्य में लोकप्रिय मंत्रिमंडल और उत्तरदायी शासन की घोषणा की।
- राजस्थान एकीकरण (25 मार्च 1948):
- दूसरे चरण (पूर्व राजस्थान संघ) में झालावाड़ का राजस्थान में पूर्ण विलय हुआ।