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जालौर जिला: ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य

जालौर, राजस्थान जिला दर्शन (District GK) पढ़ने का समय: ~1 मिनट RPSC / RSMSSB Special
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सत्यापित: 01 September 2026
मुख्य बिंदु: जालौर जिले (गोडवाड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य प्राचीन नाम: जाबालीपुर (महर्षि जाबालि की तपोभूमि होने के कारण), जालोर (जाल के वृक्षों की अधिकता के कारण)। उपनाम: ग्रेनाइट सिटी (Granite City), स्वर्णगिरि/सोनलगढ़, महर्षि जाबालि की तपोभूमि। भौगोलिक स्थिति व नदियाँ: […]
जालौर जिले (गोडवाड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:

1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य

  • प्राचीन नाम: जाबालीपुर (महर्षि जाबालि की तपोभूमि होने के कारण), जालोर (जाल के वृक्षों की अधिकता के कारण)।
  • उपनाम: ग्रेनाइट सिटी (Granite City), स्वर्णगिरि/सोनलगढ़, महर्षि जाबालि की तपोभूमि।
  • भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
    • प्रमुख नदियाँ: सूकड़ी, जवाई, बांडी, खारी, सागी।
    • पहाड़ियाँ व पर्वत:
      • सुंधा पर्वत (भीनमाल): जहाँ प्रसिद्ध सुंधा माता मंदिर और राजस्थान का प्रथम भालू अभयारण्य (Sloth Bear Sanctuary, 2008) स्थित है।
      • स्वर्णगिरि / कनकांचल पहाड़ी: जिस पर ऐतिहासिक जालौर दुर्ग निर्मित है।
      • रोजा भाखर, इसराना भाखर, झारोला पहाड़: जिले की प्रमुख अरावली श्रेणियाँ।
    • खनिज संपदा: पीला व गुलाबी ग्रेनाइट (जालौर का ग्रेनाइट उद्योग एशिया प्रसिद्ध है), फ्लोराइट, जिप्सम।
    • कृषि संपदा: इसबगोल (घोड़ा जीरा), जीरा व अरंडी के उत्पादन में राज्य का अग्रणी क्षेत्र (राष्ट्रीय इसबगोल अनुसंधान केंद्र की स्थापना)।

2. राजवंश एवं प्रमुख शासक

  • गुर्जर-प्रतिहार वंश: 8वीं शताब्दी में प्रतिहार सम्राट वत्सराज और नागभट्ट प्रथम ने भीनमाल/जालौर को अपनी शक्ति का प्रमुख केंद्र बनाया।
  • सोनगरा चौहान वंश (1181–1311 ई.):
    • कीर्तिपाल (कीतू) चौहान (1181 ई.): नाडोल शाखा से आकर जालौर में सोनगरा चौहान शाखा की स्थापना की। मुहणौत नैणसी ने इन्हें ‘कीतू एक महान राजा’ की उपाधि दी।
    • समरसिंह व उदयसिंह: दुर्ग का सुदृढ़ीकरण और साम्राज्य विस्तार किया।
    • कान्हड़दे चौहान (1296–1311 ई.): जालौर के सबसे प्रतापी शासक; इन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात अभियान के दौरान मुग़ल/तुर्क सेना को रास्ता देने से इनकार किया और 1311 ई. के ऐतिहासिक साके का नेतृत्व किया।
    • वीरमदेव (कान्हड़दे के पुत्र): अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री शहजादी फिरोजा के एकतरफा प्रेम प्रस्ताव को अस्वीकार कर स्वाभिमान हेतु युद्धभूमि में प्राण न्योछावर किए।

3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल

  • भीनमाल (प्राचीन नाम: श्रीमाल / पो-लो-मो-लो):
    • चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) 641 ई. में यहाँ आया था और अपनी पुस्तक ‘सी-यू-की’ में भीनमाल को ‘पो-लो-मो-लो’ लिखा।
    • महान खगोलशास्त्री व गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त (जिन्होंने ‘ब्रह्मस्फुट सिद्धांत’ व ‘खंडखाद्यक’ की रचना की और ‘शून्य’ व ‘गुरुत्वाकर्षण’ के प्रारंभिक नियम बताए) की जन्मस्थली।
    • संस्कृत के प्रकांड महाकवि माघ (ग्रंथ: शिशुपालवधम्) की जन्मभूमि।
    • रोमन एम्फोरा (सुरापात्र): भीनमाल के उत्खनन से प्राचीन यूनानी/रोमन व्यापारिक संबंधों के प्रमाण मिले हैं।

4. प्रमुख दुर्ग, मंदिर एवं स्थापत्य

स्मारक / स्थल निर्माता प्रमुख विशेषता
जालौर दुर्ग (स्वर्णगिरि / सोनलगढ़) नागभट्ट प्रथम (प्रतिहार काल) सुवर्णगिरि पहाड़ी पर सूकड़ी नदी के किनारे स्थित गिरि दुर्ग। हसन निजामी (ताज-उल-मासिर) का प्रसिद्ध कथन: “यह एक ऐसा अभेद्य दुर्ग है जिसका दरवाजा कोई भी आक्रमणकारी कभी नहीं खोल सका।”
तोपखाना मस्जिद (अलाई मस्जिद) मूलतः राजा भोज द्वारा निर्मित ‘सरस्वती कंठाभरण पाठशाला’, जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने मस्जिद में बदल दिया परमार कालीन उत्कृष्ट नक्काशीदार 64 खंभों वाली ऐतिहासिक इमारत।
सुंधा माता मंदिर (भीनमाल) चाचिंगदेव चौहान (1262 ई.) सुंधा पर्वत पर स्थित; चामुंडा देवी का धड़-रहित (केवल शीश/अघटेश्वरी) स्वरूप पूजा जाता है। यहाँ 20 दिसंबर 2006 को राजस्थान का पहला रोपवे (800 मीटर) शुरू किया गया था।
सिरे मंदिर (जालौर) महाराजा मानसिंह (जोधपुर) जालौर की कन्यागिरि पहाड़ी पर स्थित नाथ संप्रदाय (जलंधरनाथ जी की तपोभूमि) का भव्य ऐतिहासिक मंदिर।
आशापुरा माता मंदिर (मोदरां) सोनगरा चौहान काल सोनगरा चौहानों की कुलदेवी; इन्हें ‘महोदरी माता’ भी कहा जाता है।
आपेश्वर महादेव मंदिर (रामसीन) प्रतिहार काल प्राचीन भूमिज/गुर्जर-प्रतिहार शैली का ऐतिहासिक शिव मंदिर।

5. जालौर दुर्ग का ऐतिहासिक साका (1311 ई.)

  • आक्रमणकारी: दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी (सेनापति: कमालुद्दीन गुर्ग)।
  • शासक / नायक: कान्हड़दे चौहान एवं उनके पुत्र वीरमदेव।
  • विश्वासघात: देशद्रोही बीका दहिया ने दुर्ग के गुप्त रास्ते (कमजोर दीवार) की जानकारी तुर्कों को दे दी।
  • कहावत: रातों-रात दीवार की मरम्मत हेतु भारी कीमत पर राई खरीदी गई, जिससे प्रसिद्ध लोकोक्ति बनी — “राई रा भाव तो रातै ई गया।”
  • परिणाम: कान्हड़दे और वीरमदेव लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए (केसरिया); वीरांगनाओं ने रानी जैतलदे के नेतृत्व में जौहर किया। खिलजी ने दुर्ग जीतकर इसका नाम ‘जलालाबाद’ रखा।

6. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं तीर्थ

  • लोकदेवता तल्लीनाथ जी:
    • मारवाड़/जालौर के प्रसिद्ध लोकदेवता (मूल नाम: गांगदेव राठौड़); गुरु: जलंधरनाथ।
    • प्रमुख थान: पाँचोटा गाँव (जालौर) में पंचमुखी पहाड़ी पर।
    • इन्हें ‘ओरण का देवता’ और ‘प्रकृति प्रेमी लोकदेवता’ कहा जाता है (जहाँ पेड़-पौधे काटना पूर्णतः वर्जित होता है)।
  • संत जलंधरनाथ जी: नाथ संप्रदाय के सिद्ध संत; सिरे मंदिर (जालौर) इनकी मुख्य तपोभूमि रही।
  • मलिक शाह पीर की दरगाह: जालौर दुर्ग परिसर में स्थित प्रसिद्ध सूफी दरगाह।

7. कला, संस्कृति एवं हस्तशिल्प

  • ढोल नृत्य (Dhol Dance):
    • जालौर का सबसे प्रसिद्ध पुरुष प्रधान व्यावसायिक लोक नृत्य; विवाह के अवसर पर सरगड़ा, ढोली, माली और भील जातियों द्वारा किया जाता है।
    • थाकना शैली: ढोल को पहले ‘थाकना’ (उत्साहवर्धक लय) में बजाया जाता है, फिर नर्तक मुंह में तलवार, हाथों में रुमाल व डंडे लेकर नृत्य करते हैं।
    • इसे प्रकाश में लाने का श्रेय राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास को जाता है।
  • हस्तशिल्प व उद्योग:
    • हरजी गाँव के मिट्टी के घोड़े: हरजी (जालौर) के कुम्हारों द्वारा लोकदेवता मामाजी के मिट्टी के घोड़े बनाए जाते हैं, जो राजस्थान भर में विख्यात हैं।
    • लेटा गाँव के खेसले: लेटा (जालौर) में सूत से तैयार कलात्मक ‘खेसले’ (ओढ़ने की चादरें) अपने टिकाऊपन हेतु प्रसिद्ध हैं।
    • कशीदाकारी जूतियाँ: भीनमाल की जरी व कशीदाकारी युक्त चमड़े की मोजड़ियाँ।

8. प्रमुख साहित्यकार एवं विद्वान

  • महाकवि माघ (भीनमाल): 7वीं शताब्दी के महान संस्कृत कवि; विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य ‘शिशुपालवधम्’ के रचयिता।
    • विशेषता: भारतीय साहित्य में इनके लिए कहा गया है — “उपमा कालिदासस्य, भारवेरर्थगौरवम्। दण्डिनः पदलालित्यं, माघे सन्ति त्रयो गुणाः॥” (माघ में कालिदास की उपमा, भारवि का अर्थगौरव और दण्डी का पदलालित्य तीनों समाहित हैं)।
  • ब्रह्मगुप्त (भीनमाल): प्राचीन भारत के महान ज्योतिषी व गणितज्ञ; ग्रंथ: ब्रह्मस्फुट सिद्धांत।
  • उद्योतन सूरी (8वीं सदी): प्रतिहार शासक वत्सराज के समय 778 ई. में जालौर दुर्ग में रहकर प्रसिद्ध प्राकृत ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ की रचना की (जिसमें 18 देशी भाषाओं में ‘मरुभाषा’ का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है)।
  • पद्मनाभ: कान्हड़दे के वंशज अखैराज के दरबारी कवि; प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ ‘कान्हड़दे प्रबंध’ और ‘वीरमदे सोनगरा री वात’ के रचयिता।

9. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रजामंडल आंदोलन

  • मारवाड़ लोक परिषद का प्रभाव: जालौर क्षेत्र मारवाड़ रियासत का अंग होने के कारण जयनारायण व्यास, मथुरादास माथुर आदि के आंदोलनों का केंद्र रहा।
  • जालौर में जागीरदारी विरोधी आंदोलन:
    • किसानों पर लगाए गए अनुचित करों (‘लाग-बाग’) और बेगार प्रथा के विरुद्ध संघर्ष।
  • फतेहराज जोशी व चांदमल सुराणा: गोडवाड़ व जालौर अंचल में सामाजिक सुधारों और जनजागृति के प्रमुख नेता।

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