मुख्य बिंदु: डूंगरपुर जिले (वागड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य उपनाम: पहाड़ों की नगरी (City of Mountains), वागड़ का पुष्कर (बेणेश्वर धाम), साक्षर आदिवासी जिला। स्थापना: 1356 ई. में रावल वीरसिंह द्वारा डूंगरिया भील को पराजित कर डूंगरपुर नगर बसाया गया। भौगोलिक […]
डूंगरपुर जिले (वागड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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उपनाम: पहाड़ों की नगरी (City of Mountains), वागड़ का पुष्कर (बेणेश्वर धाम), साक्षर आदिवासी जिला।
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स्थापना: 1356 ई. में रावल वीरसिंह द्वारा डूंगरिया भील को पराजित कर डूंगरपुर नगर बसाया गया।
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भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
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प्रमुख नदियाँ: सोम (बीछामेड़ा से), माही, जाखम, मोरेन, वात्रक, भद्र।
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त्रिवेणी संगम (नवाटापुरा): सोम, माही और जाखम नदियों का प्रसिद्ध संगम।
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झीलें व जलस्रोत:
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गेपसागर (एडवर्ड सागर): महारावल गोपीनाथ द्वारा 1428 ई. में निर्मित प्राकृतिक सुंदर झील।
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उदयविलास पैलेस झील परिसर व एडवर्ड समंद।
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खनिज संपदा:
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फ्लोराइट (Fluorite): मांडो की पाल (Mando-ki-Pal) – एशिया का सबसे बड़ा भंडार।
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हरा संगमरमर (Green Marble): ऋषभदेव व डूंगरपुर सीमा क्षेत्र।
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घिया पत्थर (Soapstone / Steatite): बोदीगामा, देवल।
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2. राजवंश एवं प्रमुख शासक
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राजवंश: गुहिल वंश की अहड़ा (सिसोदिया) शाखा।
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संस्थापक: 12वीं शताब्दी में सामंतसिंह (मेवाड़ के शासक) ने कीर्तिपाल चौहान से पराजित होने के बाद वागड़ में आकर स्वतंत्र गुहिल शाखा स्थापित की।
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प्रमुख शासक व योगदान:
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रावल वीरसिंह: डूंगरपुर राज्य के संस्थापक (1356 ई.)।
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महारावल गोपीनाथ: गेपसागर झील और ‘बादल महल’ का निर्माण कराया।
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महारावल सोमदास: कला व विद्वानों के महान संरक्षक।
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महारावल शिवसिंह: 1818 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की।
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महारावल उदयसिंह द्वितीय: 1857 की क्रांति के समय अंग्रेजों की सहायता की।
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महारावल लक्ष्मण सिंह: स्वतंत्रता के समय डूंगरपुर के अंतिम शासक; राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष और प्रसिद्ध निशानेबाज/संरक्षक।
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3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
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बड़ौदा (प्राचीन नाम: वटपद्रक): वागड़ की प्राचीन राजधानी; 11वीं-12वीं सदी के शिव व जैन मंदिरों के प्राचीन अवशेष।
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गलियाकोट: माही नदी के तट पर स्थित मध्यकालीन व्यापारिक व धार्मिक केंद्र; परमार कालीन सभ्यता के ध्वंसावशेष।
4. प्रमुख महल, दुर्ग एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| जूना महल (डूंगरपुर दुर्ग) | रावल वीरसिंह (13वीं सदी) | पहाड़ी पर स्थित 7 मंजिला अभेद्य महल; आंतरिक दीवारों पर शीशे की जड़ाई, नीले-हरे रंगों के उत्कृष्ट भित्तिचित्र और कामशास्त्र आधारित चित्रण हेतु प्रसिद्ध। |
| उदयविलास पैलेस | महारावल उदयसिंह द्वितीय | गेपसागर झील के किनारे पारेवा (हरे-नीले) पत्थर से निर्मित राजपूत व यूरोपीय स्थापत्य का अद्भुत संगम; वर्तमान में हेरिटेज होटल। |
| बादल महल | महारावल गोपीनाथ / पुंजराज | गेपसागर झील के मध्य स्थित ग्रीष्मकालीन महल; प्राकृतिक ठंडक हेतु प्रसिद्ध। |
| देव सोमनाथ मंदिर | 12वीं शताब्दी (अमृतपाल काल) | सोम नदी के तट पर सफेद पारेवा पत्थर से निर्मित; बिना चूने या गारे के केवल पत्थरों को आपस में फंसाकर (Interlocking system) बनाया गया 3 मंजिला प्राचीन शिवालय। |
| विजय राजराजेश्वर मंदिर | महारावल विजयसिंह (पूर्ण: लक्ष्मणसिंह) | गेपसागर किनारे स्थित भगवान शिव और माता पार्वती का भव्य संगमरमर मंदिर। |
| नौलखा बावड़ी | रानी प्रीमलदेवी (1586 ई.) | महारावल आसकरण की रानी द्वारा निर्मित 3 मंजिला कलात्मक बावड़ी; उत्कृष्ट जल स्थापत्य का नमूना। |
5. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं तीर्थ
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बेणेश्वर धाम (नवाटापुरा, आसपुर):
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सोम, माही व जाखम के त्रिवेणी संगम पर स्थित ‘आदिवासियों का महाकुंभ’ / ‘वागड़ का पुष्कर’।
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विशेषता: विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर जहाँ खंडित शिवलिंग (पांच जगह से खंडित) की पूजा होती है।
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संस्थापक: संत मावजी महाराज।
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मेला: प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को विशाल लक्खी मेला भरता है जहाँ आदिवासी अपने पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन करते हैं।
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संत मावजी महाराज (साबला धाम):
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जन्म: साबला (डूंगरपुर); इन्हें भगवान विष्णु का ‘कल्कि (निष्कलंक) अवतार’ माना जाता है।
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इन्होंने ‘निष्कलंक संप्रदाय’ की स्थापना की।
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ग्रंथ: ‘चोपड़ा’ (वागड़ी भाषा में रचित भविष्यवाणियों के ग्रंथ, जो केवल दीपावली पर बाहर निकाले जाते हैं)।
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सैयद फखरुद्दीन की दरगाह (गलियाकोट):
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माही नदी के तट पर स्थित दाऊदी बोहरा संप्रदाय की विश्व प्रसिद्ध प्रधान पीठ (उर्स: मुहर्रम माह की 27 तारीख को भरता है)।
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पास में ही शीतला माता मंदिर भी स्थित है।
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गौरी बाई (वागड़ की मीरा):
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18वीं शताब्दी में डूंगरपुर में जन्मी नागर ब्राह्मण कवयित्री; कृष्ण भक्ति पदों की रचना की (महारावल शिवसिंह ने इनके लिए ‘बालमुकुंद मंदिर’ बनवाया था)।
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6. ऐतिहासिक जनक्रांतियाँ एवं बलिदान
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रास्तापाल कांड (19 जून 1947):
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रास्तापाल गाँव में प्रजामंडल की पाठशाला बंद कराने पहुंचे रियासती सैनिकों ने शिक्षक सेंगाभाई को ट्रक के पीछे घसीटना शुरू किया।
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13 वर्षीय भील बालिका कालीबाई ने अपनी दरांती (हंसिये) से रस्सी काटकर अपने गुरु को बचाया।
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सैनिकों की अंधाधुंध गोलियों से कालीबाई और शिक्षक नानाभाई खांट शहीद हो गए।
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स्मारक: गेपसागर झील के किनारे कालीबाई व नानाभाई खांट का पैनोरमा/स्मारक बना है। राजस्थान सरकार बालिकाओं को स्कूटी वितरण योजना कालीबाई के नाम पर चलाती है।
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पूनवाड़ा कांड (मई 1947): रास्तापाल जैसा ही दमनकारी हत्याकांड जहाँ पाठशाला के शिक्षक शिवराम भील को बुरी तरह पीटा गया था।
7. कला, संस्कृति, जनजाति एवं हस्तशिल्प
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रमकड़ा उद्योग (Soapstone Toys, गलियाकोट):
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घिया पत्थर (सॉफ्ट स्टोन/पारेवा पत्थर) को तराशकर कलात्मक खिलौने, मूर्तियां, दीये व सजावटी सामान बनाना (जीआई पहचान)।
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तीर-कमान निर्माण: बोदीगामा गाँव के पारंपरिक लोहे व बांस के तीर-कमान।
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वागड़ी बोली: डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र की स्थानीय बोली; डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने इसे ‘भीली बोली’ कहा था।
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लोक नृत्य:
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पेजण नृत्य: दीपावली के अवसर पर पुरुषों द्वारा महिलाओं के वस्त्र पहनकर पैरों में घुंघरू बांधकर किया जाने वाला नृत्य।
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हुर्रा/भगोरिया नृत्य: होली पर आदिवासियों का पारंपरिक नृत्य।
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8. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रजामंडल आंदोलन
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डूंगरपुर प्रजामंडल (1944 ई.):
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संस्थापक: भोगीलाल पांड्या (‘वागड़ के गांधी’), हरिदेव जोशी, गौरीशंकर उपाध्याय और शिवलाल कोटड़िया।
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भोगीलाल पांड्या:
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जन्म: सीमलवाड़ा (डूंगरपुर); वागड़ क्षेत्र में शिक्षा, अछूतोद्धार और जनचेतना के अमर सेनानी; ‘वागड़ सेवा मंदिर’ (1935) व ‘हरिजन सेवा समिति’ की स्थापना की।
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हरिदेव जोशी: खांदू (बांसवाड़ा/डूंगरपुर अंचल) के जननायक; 10 बार लगातार विधायक रहे और राजस्थान के 3 बार मुख्यमंत्री बने (एक हाथ न होने के कारण ‘अपंग जननायक’ भी कहलाए)।
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राजस्थान एकीकरण (25 मार्च 1948):
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द्वितीय चरण (पूर्व राजस्थान संघ) में डूंगरपुर रियासत का राजस्थान में विलय हुआ।
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