मुख्य बिंदु: दौसा जिले (ढूंढाड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य नामकरण व भौगोलिक आकृति: देवगिरि पहाड़ी की तलहटी में स्थित होने तथा ‘दोष मुक्त’ स्थल होने के कारण इसे ‘दौसा’ कहा गया। जिले की भौगोलिक आकृति धनुषाकार (Bow-shaped) है। उपनाम: कछवाहा राजवंश […]
दौसा जिले (ढूंढाड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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नामकरण व भौगोलिक आकृति: देवगिरि पहाड़ी की तलहटी में स्थित होने तथा ‘दोष मुक्त’ स्थल होने के कारण इसे ‘दौसा’ कहा गया। जिले की भौगोलिक आकृति धनुषाकार (Bow-shaped) है।
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उपनाम: कछवाहा राजवंश की प्रथम राजधानी, बावड़ियों व ऐतिहासिक आभा की नगरी, देवनागरी।
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स्थापना व गठन:
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1137 ई. में कछवाहा शासक दूल्हा राय (तेजकरण) द्वारा बड़गूजरों को हराकर ढूंढाड़ में कछवाहा वंश की पहली राजधानी स्थापित की गई।
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10 अप्रैल 1991 को जयपुर जिले से पृथक कर स्वतंत्र जिला बनाया गया (1992 में सवाई माधोपुर की महुवा तहसील को भी इसमें जोड़ा गया)।
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भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
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प्रमुख नदियाँ: बाणगंगा (अर्जुन की गंगा), मोरेल नदी, ढूंढ, सावा।
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प्रमुख बांध व जल परियोजनाएं:
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माधोसागर बांध: बाणगंगा नदी तंत्र पर निर्मित।
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रेडियो बांध, कालखो बांध, चीता डूंगरी बांध व मोरेल बांध (दौसा-सवाई माधोपुर सीमा)।
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पहाड़ियाँ: देवगिरि पहाड़ी (जिस पर दौसा दुर्ग स्थित है), झांझीरामपुरा पहाड़ियाँ।
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2. राजवंश एवं प्रमुख शासक
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प्रारंभिक शासक: बड़गूजर राजपूत एवं मीणा शासक।
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कछवाहा राजवंश (ढूंढाड़ की प्रथम राजधानी):
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दूल्हा राय (तेजकरण, 1137 ई.): नरवर (ग्वालियर) से आकर बड़गूजरों को पराजित किया और दौसा को कछवाहा वंश की सर्वप्रथम राजधानी बनाया। (इसके बाद क्रमशः जमवारामगढ़, आमेर और अंत में जयपुर राजधानी बनी)।
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पृथ्वीराज कछवाहा: खानवा युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की ओर से लड़े; इनके समय दौसा क्षेत्र उनके पुत्रों के जागीरी क्षेत्रों में बंटा।
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निकाजी व बड़गूजर सरदार: आभानेरी व बसवा क्षेत्र के प्रारंभिक सामंत।
3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
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आभानेरी (प्राचीन नाम: आभा नगरी – ‘चमकता हुआ नगर’):
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बांदीकुई के निकट 8वीं-9वीं शताब्दी का गुर्जर-प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला का विश्व प्रसिद्ध केंद्र।
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भांडारेज (प्राचीन नाम: भद्रावती):
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महाभारत कालीन प्राचीन नगर; गुप्तकालीन और मौर्यकालीन मृद्भाण्ड, बौद्ध स्तूप और प्राचीन सिक्के प्राप्त हुए हैं।
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बसवा (Baswa):
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ऐतिहासिक कस्बा जहाँ 1528 ई. में खानवा युद्ध के बाद महाराणा सांगा का इलाज/प्राणोत्सर्ग हुआ था; यहाँ महाराणा सांगा का चबूतरा (स्मारक) स्थित है।
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4. प्रमुख दुर्ग, बावड़ियाँ एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| चांद बावड़ी (आभानेरी) | निकुंभ राजा चंद्र (8वीं-9वीं सदी) | विश्व की सबसे गहरी और कलात्मक बावड़ी; 13 मंजिला गहरी, 3500 कलात्मक सीढ़ियाँ (ज्यामितीय प्रतिरूप)। अंधेरे में चमकने वाले सफेद व नीले पत्थरों का स्थापत्य। भूल-भुलैया जैसा दृश्य। |
| हर्षद माता मंदिर (आभानेरी) | गुर्जर-प्रतिहार काल (8वीं सदी) | चांद बावड़ी के सामने स्थित; मूल रूप से भगवान विष्णु को समर्पित महा-मारू शैली का पंचायतन मंदिर; वर्तमान में हर्ष और उल्लास की देवी ‘हर्षद माता’ के रूप में पूज्य। |
| दौसा का किला | बड़गूजर शासक / कछवाहा काल | देवगिरि पहाड़ी पर सूप (छाजले) की आकृति में निर्मित गिरि दुर्ग; इसमें रामचंद्र जी का मंदिर, 14 राजाओं की साल व हाथीभाटा स्थित हैं। |
| भांडारेज की बावड़ी (बड़ी बावड़ी) | 11वीं शताब्दी | 5 मंजिला भूमिगत कलात्मक बावड़ी; उत्कृष्ट जल-संरक्षण संरचना। |
| गीजगढ़ का किला | स्थानीय जागीरदार | सामरिक दृष्टि से निर्मित पहाड़ी दुर्ग। |
| खांवरा रावजी की हवेलियाँ व किला | रावजी सामंत | सुंदर भित्तिचित्रों व मध्यकालीन राजपूत स्थापत्य हेतु प्रसिद्ध। |
5. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं तीर्थ
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मेहंदीपुर बालाजी मंदिर (मानपुर-सिकंदरा मार्ग):
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अरावली की दो पहाड़ियों के बीच स्थित हनुमान जी का प्रसिद्ध बाल स्वरूप धाम।
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विशेषता: भूत-प्रेत बाधा, ऊपरी हवाओं और मानसिक विक्षिप्तता के आध्यात्मिक उपचार हेतु पूरे भारत में विख्यात।
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यहाँ बालाजी महाराज, प्रेतराज सरकार और भैरव जी (कोतवाल) की त्रिमूर्ति स्थापित है।
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संत सुंदरदास जी (दादू पंथ के महान संत):
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जन्म: दौसा (1596 ई.) में खंडेलवाल वैश्य परिवार में; संत दादू दयाल जी के प्रमुख शिष्य।
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इन्होंने ‘नागा साधु शाखा’ और ‘खाकी शाखा’ का संगठन किया; संत साहित्य में इन्हें ‘हिंदी साहित्य का श्रृंगारिक व हास्य रस विरोधी विद्वान संत’ माना जाता है।
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प्रमुख ग्रंथ: सुंदर विलास, ज्ञान सवैया, सुंदर ग्रंथावली (दौसा में इनका स्मारक व पैनोरमा बना है)।
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झांझीरामपुरा तीर्थ (बसवा):
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108 प्राकृतिक शिवलिंगों व गोमुख से निरंतर बहने वाले प्राकृतिक जलप्रपात हेतु प्रसिद्ध शिवालय।
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पपलाज माता मंदिर (लालसोट):
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अरावली पहाड़ियों में स्थित गुर्जर व स्थानीय मीणा समाज की परम पूज्य लोकदेवी।
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नीलकंठ महादेव (दौसा): देवगिरि पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक प्राचीन शिवालय।
6. कला, संस्कृति, हस्तशिल्प एवं लोकनाट्य
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हेला ख्याल (Hela Khyal, लालसोट):
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दौसा के लालसोट क्षेत्र का विश्व प्रसिद्ध लोकनाट्य।
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प्रवर्तक: हेला शायर।
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विशेषता: इसमें लंबी आवाज में ‘हेला’ (लंबी टेर/आवाज देना) लगाया जाता है और विशाल ‘बम’ (बड़े नगाड़े) की थाप पर समसामयिक व धार्मिक विषयों पर काव्यमय दंगल होता है (गणगौर व होली के अवसर पर)।
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लवाण गाँव की दरियां (Lawan Durries):
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लवाण गाँव सूत व ऊन से निर्मित अपनी मजबूत व कलात्मक हाथ से बुनी दरियों (Durries) के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
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सिकंदरा का प्रस्तर शिल्प (Stone Carving):
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सिकंदरा (दौसा) सैंडस्टोन (बलुआ पत्थर) की बारीक जालियों, फव्वारों, स्तंभों और मूर्तिकला के निर्माण का प्रमुख राष्ट्रीय केंद्र है।
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आभानेरी महोत्सव: पर्यटन विभाग द्वारा प्रतिवर्ष शरद ऋतु में चांद बावड़ी के प्रांगण में आयोजित शास्त्रीय संगीत व लोक कला उत्सव।
7. प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, विभूतियाँ एवं जननायक
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पं. टीकाराम पालीवाल:
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जन्म: मंडावर (दौसा); राजस्थान के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री (First Elected Chief Minister – 1952)।
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राजेश पायलट (1945–2000 ई.):
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भारतीय वायुसेना के पूर्व पायलट व प्रखर राष्ट्रीय राजनेता; दौसा लोकसभा क्षेत्र से सांसद व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रहे (दौसा के विकास व सड़क नेटवर्क के प्रणेता)।
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पं. नवल किशोर शर्मा: दौसा के प्रमुख गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी, केंद्रीय मंत्री एवं गुजरात के पूर्व राज्यपाल।
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रामकरण जोशी: 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जयपुर-दौसा क्षेत्र में ‘आजाद मोर्चा’ के प्रमुख नेता।
8. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रजामंडल आंदोलन
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जयपुर प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन (1938 ई.):
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8-9 मई 1938 को जयपुर राज्य प्रजामंडल का पहला ऐतिहासिक अधिवेशन दौसा में आयोजित हुआ था, जिसकी अध्यक्षता सेठ जमनालाल बजाज ने की थी (कस्तूरबा गांधी भी इसमें उपस्थित हुई थीं)।
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खादी व रचनात्मक कार्य: दौसा स्वतंत्रता आंदोलन के समय खादी उत्पादन, अस्पृश्यता निवारण और चरखा संघ की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा।