मुख्य बिंदु: भीलवाड़ा जिले (मेवाड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य नामकरण: भील जाति की बहुलता व भीलों द्वारा बसाए जाने के कारण इसका नाम ‘भीलवाड़ा’ पड़ा (रियासत काल में यहाँ ‘भीलाड़ी’ सिक्के ढाले जाते थे)। उपनाम: राजस्थान का मैनचेस्टर (Manchester of Rajasthan), […]
भीलवाड़ा जिले (मेवाड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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नामकरण: भील जाति की बहुलता व भीलों द्वारा बसाए जाने के कारण इसका नाम ‘भीलवाड़ा’ पड़ा (रियासत काल में यहाँ ‘भीलाड़ी’ सिक्के ढाले जाते थे)।
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उपनाम: राजस्थान का मैनचेस्टर (Manchester of Rajasthan), वस्त्र नगरी (Textile City), अभ्रक नगरी (Mica City), तालाबों की नगरी।
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भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
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प्रमुख नदियाँ: बनास, कोठारी (दिवेर से निकलकर बनास में मिलती है), खारी, बेड़च (आयड़), मेनाल, मानसी।
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त्रिवेणी संगम (बीगोद): बनास, बेड़च और मेनाल नदियों का पवित्र संगम स्थल।
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जलप्रपात: मेनाल जलप्रपात (मेनाल नदी पर 150 फीट गहरा विहंगम प्राकृतिक जलप्रपात)।
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प्रमुख बांध व जलाशय:
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मेजा बांध (कोठारी नदी): भीलवाड़ा शहर का प्रमुख जलस्रोत (इसकी पाल पर विकसित पार्क ‘ग्रीन माउंट’ कहलाता है)।
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सरेरी बांध व खारी बांध।
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खनिज संपदा:
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अभ्रक (Mica): दाता-भूणास, बनेड़ा, फूलिया (अभ्रक ईंट उद्योग – Mica Brick Industry)।
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सीसा-जस्ता: रामपुरा-आगूचा (विश्व स्तरीय उच्चतम ग्रेड की सीसा-जस्ता खदान)।
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लोहा (Iron Ore): तिरंगा क्षेत्र, हमीरगढ़, बनेड़ा।
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2. राजवंश एवं प्रमुख इतिहास
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मेवाड़ रियासत का अंग: भीलवाड़ा ऐतिहासिक रूप से मेवाड़ का अभिन्न सामरिक क्षेत्र रहा (मांडलगढ़, बनेड़ा व शाहपुरा प्रमुख ठिकाने/रियासतें थीं)।
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शाहपुरा रियासत (गौतम/सिसोदिया शाखा):
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1631 ई. में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने मेवाड़ से पृथक कर सुजान सिंह सिसोदिया (राणा अमरसिंह के पौत्र) को शाहपुरा की स्वतंत्र मनसबदारी प्रदान की।
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प्रमुख व्यक्तित्व व सामंत:
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राणा सांगा: 1528 ई. में बसवा से लौटते समय मांडलगढ़ में वीरगति उपरांत अंतिम संस्कार हुआ (मांडलगढ़ में सांगा की 8 खंभों की छतरी स्थित है)।
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जगन्नाथ कछवाहा: आमेर के राजा भारमल के पुत्र व अकबर के सेनापति; मांडलगढ़ में इनकी 32 खंभों की भव्य छतरी स्थित है।
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3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
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बागोर सभ्यता (Bagor):
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कोठारी नदी के किनारे स्थित मध्य पाषाण कालीन (Mesolithic) महातीर्थ।
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उत्खनन: डॉ. वी.एन. मिश्र (1967-70 ई.)।
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प्रमुख साक्ष्य: भारत में पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य (5000 ई.पू.), महासतियों का टीला, तांबे के छेद वाले सुई-बाणाग्र और 14 प्रकार के सूक्ष्म पाषाण औजार (Microliths)।
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ओझियाना सभ्यता: बदनोर के निकट कोठारी नदी बेसिन में स्थित ताम्र-युगीन स्थल (सफेद रंग से चित्रित बैल ‘ओझियाना बुल’ व गाय की मृण्मूर्तियां प्राप्त)।
4. प्रमुख दुर्ग, मंदिर एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| मांडलगढ़ दुर्ग | मांडिया भील / चाणणा गुर्जर (जीर्णोद्धार: महाराणा कुंभा) | अरावली की पहाड़ी पर कटोरे (मंडलाकार) की आकृति में स्थित गिरि दुर्ग। इसमें सागर-सागरी जलाशय, जलेश्वर महादेव और राणा सांगा व जगन्नाथ कछवाहा की छतरी स्थित है। हल्दीघाटी युद्ध से पूर्व मानसिंह ने इसी दुर्ग में रहकर युद्ध व्यूहरचना बनाई थी। |
| महानालेश्वर मंदिर (मेनाल) | पृथ्वीराज द्वितीय / चाहमान काल (12वीं सदी) | मेनाल जलप्रपात के मुहाने पर स्थित भूमिज/नागर शैली का उत्कृष्ट शिव मंदिर; इसके सामने कलात्मक मठ व शिवालय समूह स्थित हैं। |
| बनेड़ा दुर्ग | राजा अमरसिंह (1681 ई.) | बैराठ पहाड़ी पर स्थित एक ऐसा किला जो आज भी अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित है। |
| बदनोर का बैराठ दुर्ग | महाराणा कुंभा (1457 ई.) | मालवा के महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति में कुंभा द्वारा निर्मित; यहाँ कुशाल माता का मंदिर स्थित है। |
| हरणी महादेव | प्राकृतिक गुफा | पहाड़ी की तलहटी में स्थित प्रसिद्ध प्राचीन शिवालय। |
| तिलस्वां महादेव (मांडलगढ़) | प्राकृतिक तीर्थ | चर्म रोग व कुष्ठ रोग निवारक औषधीय जलकुंड हेतु विख्यात शिवालय। |
5. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं संप्रदाय
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लोकदेवता भगवान श्री देवनारायण जी (आसींद):
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जन्म: मालासेरी की डूंगरी (आसींद, भीलवाड़ा) में बगड़ावत नागवंशीय गुर्जर परिवार में।
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खारी नदी के तट पर सवाई भोज मंदिर (आसींद) गुर्जर समाज का सर्वोच्च आस्था धाम है (नीम की पत्तियों और ईंटों से पूजा)।
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देवनारायण जी की फड़: राजस्थान की सबसे लंबी, सबसे छोटी और सर्वाधिक चित्रांकन वाली फड़; जंतर वाद्ययंत्र के साथ गुर्जर भोपों द्वारा वाचन (1992 में इस पर 5 रुपए का डाक टिकट जारी हुआ)।
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रामस्नेही संप्रदाय की अंतरराष्ट्रीय प्रधान पीठ (शाहपुरा):
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संस्थापक: संत रामचरण जी महाराज (1760 ई.)।
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विशेषता: निर्गुण रामभक्ति (निराकार राम की उपासना); मंदिर को ‘रामद्वारा’ कहा जाता है (जहाँ कोई मूर्ति नहीं होती, केवल गुरु के चित्र व ग्रंथ रखे जाते हैं)।
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फूलडोल महोत्सव (Phuldol Festival): चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक आयोजित होने वाला प्रसिद्ध वार्षिक मेला।
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सवाई भोज का मेला (आसींद): भाद्रपद शुक्ल छठ व सप्तमी को विशाल मेला भरता है।
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धनोप माता मंदिर (शाहपुरा सीमा): राजा धन्ना द्वारा स्थापित प्राचीन शक्तिपीठ।
6. कला, संस्कृति एवं विश्व प्रसिद्ध ‘फड़ चित्रकला’
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फड़ चित्रकला (Phad Painting / शाहपुरा):
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कपड़े (रेजी/खादी) पर प्राकृतिक रंगों से लोकदेवताओं (देवनारायण जी, पाबूजी आदि) के जीवन चरित्र का चित्रांकन।
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जोशी परिवार (शाहपुरा): फड़ चित्रण के विश्व विख्यात कलाकार।
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प्रमुख सिद्धहस्त शिल्पी: श्रीलाल जोशी (पद्मश्री विजेता), शांतिलाल जोशी, प्रकाश जोशी।
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पार्वती जोशी: भारत की प्रथम महिला फड़ चितेरी।
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प्रदीप मुखर्जी: जिन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और रामचरितमानस पर सूक्ष्म फड़ चित्र बनाए।
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नाहर नृत्य (Mandal):
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मांडलगढ़/मांडल कस्बों में चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को आयोजित; मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के आगमन पर प्रारंभ हुआ था।
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नर्तक शरीर पर रुई लपेटकर और सींग लगाकर ‘नाहर (शेर)’ का स्वांग रचते हुए ढोल की थाप पर नृत्य करते हैं।
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बहरूपिया कला (स्वांग): भीलवाड़ा के जानकीलाल भांड (अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मंकी मैन’ के रूप में ख्याति प्राप्त, पद्मश्री से सम्मानित)।
7. स्वतंत्रता संग्राम, ऐतिहासिक आंदोलन एवं अमर सेनानी
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बिजौलिया किसान आंदोलन (1897–1941 ई.) — भारत का पहला अहिंसक किसान आंदोलन:
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समय: 44 वर्षों तक चलने वाला विश्व का सबसे लंबा और पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन।
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जागीरदार: बिजौलिया के जागीरदार राव कृष्ण सिंह द्वारा 84 प्रकार की लागतें (लाग-बाग) व ‘चंवरी कर’ (1903) तथा पृथ्वी सिंह द्वारा ‘तलवार बंधाई कर’ (1906) लगाने के विरोध में।
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तीन चरण व नेतृत्व:
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प्रथम चरण (1897-1915): साधु सीताराम दास, नानजी व ठाकरी पटेल, फतेहकरण चारण।
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द्वितीय चरण (1916-1927): विजय सिंह पथिक (भूप सिंह), माणिक्यलाल वर्मा (जिन्होंने ‘पंछीड़ा’ गीत लिखा), हरिभाऊ किंकर (1917 में ‘ऊपरमाल पंच बोर्ड’ की स्थापना – सरपंच: मन्ना पटेल)।
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तृतीय चरण (1927-1941): जमनालाल बजाज और हरिभाऊ उपाध्याय (1941 में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी. राघवाचार्य के समझौते से समाप्त)।
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क्रांतिकारी बारहठ परिवार (शाहपुरा/देवपुरा) — संपूर्ण परिवार देश पर न्योछावर:
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केसरी सिंह बारहठ: क्रांतिकारी; मेवाड़ महाराणा फतेहसिंह को दिल्ली दरबार जाने से रोकने हेतु 13 सोरठे ‘चेतावनी रा चूंघट्या’ (डिंगल में) लिखे; 1910 में ‘वीर भारत सभा’ की स्थापना की।
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जोरावर सिंह बारहठ: 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका; जीवन भर भूमिगत रहे (इन्हें ‘राजस्थान का चंद्रशेखर आजाद’ कहा जाता है)।
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प्रताप सिंह बारहठ: बनारस षड्यंत्र केस में गिरफ्तार; बरेली जेल में अंग्रेज कमिश्नर क्लीवलैंड की यातनाओं के बावजूद गुप्त भेद नहीं खोले। इनका अमर कथन: “मेरी मां रोती है तो रोने दो, मैं भारत की हजारों माताओं को नहीं रुला सकता।” (मात्र 22 वर्ष की आयु में शहीद)।
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गोकुल लाल असावा: शाहपुरा के प्रमुख प्रजामंडल नेता; 25 मार्च 1948 को गठित ‘पूर्व राजस्थान संघ’ के प्रधानमंत्री बने।
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शाहपुरा — उत्तरदायी शासन स्थापित करने वाली प्रथम रियासत: 14 अगस्त 1947 को शाहपुरा के राजा सुदर्शन देव ने राजस्थान में सर्वप्रथम अपने राज्य में पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना की।