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बारां जिला: ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य

बारां, राजस्थान जिला दर्शन (District GK) पढ़ने का समय: ~1 मिनट RPSC / RSMSSB Special
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सत्यापित: 01 September 2026
मुख्य बिंदु: बारां जिले (हाड़ौती अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य नामकरण: सोलंकी राजपूतों द्वारा 12 गाँवों को मिलाकर बसाए जाने के कारण इसका नाम ‘बारां’ पड़ा। उपनाम: सहरिया जनजाति की शरणस्थली, हाड़ौती का खजुराहो (भंडदेवरा), वराह नगरी। गठन: 10 अप्रैल 1991 को […]
बारां जिले (हाड़ौती अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:

1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य

  • नामकरण: सोलंकी राजपूतों द्वारा 12 गाँवों को मिलाकर बसाए जाने के कारण इसका नाम ‘बारां’ पड़ा।
  • उपनाम: सहरिया जनजाति की शरणस्थली, हाड़ौती का खजुराहो (भंडदेवरा), वराह नगरी।
  • गठन: 10 अप्रैल 1991 को कोटा जिले से पृथक कर स्वतंत्र जिला बनाया गया।
  • भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
    • प्रमुख नदियाँ: परवन (अटरू व शेरगढ़ क्षेत्र), कालीसिंध (सीमा बनाती है), पार्वती, कुनू (सहरिया क्षेत्र), अंधेरी, ल्हासी, बिलास।
    • रामगढ़ क्रेटर (Ramgarh Meteorite Crater, मांगरोल):
      • लगभग 15 करोड़ वर्ष पूर्व उल्कापिंड गिरने से निर्मित 3.2 किमी व्यास वाला विहंगम गड्ढा (Meteorite Impact Crater)।
      • यह राजस्थान का पहला और भारत का तीसरा भू-विरासत स्थल (Geo-Heritage Site) घोषित है।
    • शाहबाद उच्च भूमि क्षेत्र: समुद्र तल से लगभग 450 मीटर ऊँचा पठारी भाग; इस क्षेत्र की सबसे ऊँची चोटी ‘कस्बाथाना’ (517 मी.) है।
    • सिंचाई परियोजनाएं: ल्हासी परियोजना, विलास सिंचाई परियोजना, बेथली परियोजना, परवन वृहद् बहुउद्देश्यीय परियोजना।

2. राजवंश एवं प्रमुख इतिहास

  • शासक परंपरा: मध्यकाल में यह क्षेत्र हाड़ा चौहानों (कोटा रियासत) के अधीन रहा; इससे पूर्व खींची, परमार और गौड़ राजपूतों का शासन रहा।
  • शेरशाह सूरी का प्रभाव: शेरशाह सूरी ने मालवा अभियान के समय कोशवर्धन दुर्ग को जीतकर उसका नाम ‘शेरगढ़’ रखा।
  • मुकुटमणि देव (16वीं सदी): शाहबाद के प्रतापी शासक, जिन्होंने शाहबाद दुर्ग का निर्माण कराया।

3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल

  • काकोनी मंदिर समूह (छबड़ा/अटरू):
    • परवन नदी के तट पर स्थित 8वीं से 12वीं शताब्दी के प्रतिहार व गुप्तोत्तर कालीन देवालयों के ध्वंसावशेष; इसे ‘मंदिरों की नगरी’ कहा जाता है।
  • कपिलधारा (किशनगंज): प्राकृतिक जलप्रपात और महर्षि कपिल मुनि से संबंधित प्राचीन गुफाएँ व शैलाश्रय।
  • गढ़पचड़ा एवं बिलासगढ़: प्राचीन ऐतिहासिक उजड़े हुए नगर (बिलासगढ़ को मुग़ल काल में नष्ट किया गया था)।

4. प्रमुख दुर्ग, मंदिर एवं स्थापत्य

स्मारक / स्थल निर्माता प्रमुख विशेषता
शेरगढ़ दुर्ग (कोशवर्धन दुर्ग) नागवंशीय शासक / जीर्णोद्धार: शेरशाह सूरी परवन नदी के तट पर स्थित जल एवं गिरि दुर्ग; इसे प्राचीन काल में ‘कोशवर्धन’ कहा जाता था। इसमें ‘जालिम सिंह की हवेली’, बौद्ध विहार और मुग़ल कालीन स्मारक स्थित हैं।
शाहबाद दुर्ग मुकुटमणि देव (1521 ई.) भामती पहाड़ी पर स्थित कुंडलिया वन से घिरा अभेद्य किला; इसमें ‘नवलबाण तोप’ (19 फीट लंबी विशाल तोप) और ‘जामा मस्जिद’ (औरंगजेब द्वारा निर्मित) स्थित है।
नाहरगढ़ दुर्ग (किशनगंज) स्थानीय जागीरदार लाल पत्थर से निर्मित दिल्ली के लाल किले की शैली का सुंदर दुर्ग।
भंडदेवरा शिव मंदिर (रामगढ़) मेद वंशीय राजा मलयवर्मा (10वीं सदी) नागर शैली में निर्मित; मैथुनरत प्रतिमाओं के अंकन के कारण इसे ‘राजस्थान का मिनी खजुराहो’ और ‘हाड़ौती का खजुराहो’ कहा जाता है।
ब्राह्मणी माता मंदिर (सोरसन) प्राकृतिक गुफा तीर्थ विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर जहाँ देवी की पीठ (Back) का श्रृंगार व पूजा की जाती है और पीठ का ही भोग लगता है।
सीताबाड़ी (केलवाड़ा) महर्षि वाल्मीकि आश्रम वाल्मीकि आश्रम, लव-कुश जन्मस्थली, सीता कुटी तथा 5 प्राकृतिक शीतल जलकुंड (सीता कुंड, लक्ष्मण कुंड, सूरज कुंड आदि)।
अटरू का गढ़गच्छ मंदिर 10वीं शताब्दी बिना चूने के पत्थरों को जोड़कर निर्मित अद्भुत स्थापत्य।

5. सहरिया जनजाति — संस्कृति व जीवनशैली

बारां जिले की किशनगंज और शाहबाद तहसील सहरिया जनजाति का मुख्य प्राकृतिक केंद्र है:
  • एकमात्र आदिम जनजाति: भारत सरकार द्वारा राजस्थान की एकमात्र जनजाति जिसे ‘आदिम जनजाति समूह’ (PTG – Primitive Tribal Group) में शामिल किया गया है।
  • सामाजिक शब्दावली:
    • सहराना: सहरिया बस्ती।
    • हथाई / बंगला: गाँव के बीच स्थित सामुदायिक बैठक स्थल।
    • कोतवाल: सहरिया समाज का मुखिया।
    • धारी संस्कार: मृत्यु के तीसरे दिन राख को देखकर पुनर्जन्म का अनुमान लगाने की अनूठी परंपरा।
  • लोक नृत्य व देवता:
    • शिकारी नृत्य: सहरिया पुरुषों द्वारा वेशभूषा पहनकर शिकार का अभिनय करते हुए किया जाने वाला वीर रस प्रधान नृत्य।
    • इंद्रपरी, झेला व लहंगी नृत्य।
    • आराध्य देव: तेजाजी महाराज एवं महर्षि वाल्मीकि (कुलगुरु); कुलदेवी: कोड़िया देवी।
  • सीताबाड़ी का मेला (ज्येष्ठ अमावस्या): इसे ‘सहरिया जनजाति का कुंभ’ और ‘हाड़ौती अंचल का सबसे बड़ा मेला’ कहा जाता है।

6. कला, संस्कृति, हस्तशिल्प एवं मेले

  • डोल मेला (श्रीजी का मेला, बारां):
    • जलझूलनी (भाद्रपद शुक्ल एकादशी) के अवसर पर आयोजित 15 दिवसीय ऐतिहासिक मेला; इसमें विभिन्न अखाड़ों और श्रीजी की ‘डोल’ (विमान) यात्रा निकलती है।
  • सोरसन का गधों का मेला: माघ शुक्ल सप्तमी को लगने वाला गधों और खच्चरों का राज्य स्तरीय व्यापार मेला।
  • सोरसन घास मैदान (Sorsan Grasslands):
    • विलुप्तप्राय राज्य पक्षी गोडावण (Great Indian Bustard) और कृष्णमृग (Blackbuck) का प्रमुख प्राकृतिक आवास।
  • धनुष लीला (अटरू): भगवान राम द्वारा धनुष तोड़ने की ढाई सौ वर्ष पुरानी पारंपरिक लोक नाट्य परंपरा।

7. उद्योग, कृषि एवं ऊर्जा

  • छबड़ा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट (मोतीपुरा, छबड़ा):
    • राजस्थान का प्रमुख कोयला आधारित ताप विद्युत गृह (विशाल विद्युत उत्पादन क्षमता)।
    • राजस्थान का पहला अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल पावर प्लांट।
  • अंता गैस विद्युत गृह (NTPC):
    • राजस्थान का प्रथम गैस आधारित विद्युत संयंत्र (केंद्र सरकार का उपक्रम)।
  • लहसुन मंडी (छिपाबड़ौद):
    • बारां राजस्थान में सर्वाधिक लहसुन उत्पादक जिला है; छिपाबड़ौद में राज्य की विशिष्ट लहसुन मंडी स्थित है।

8. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रजामंडल आंदोलन

  • कोटा प्रजामंडल का अभिन्न अंग: बारां पूर्व में कोटा रियासत की प्रमुख निजामत थी; अतः पं. नयनूराम शर्मा और अभिन्न हरि के नेतृत्व में हाड़ौती प्रजामंडल के आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा।
  • 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन: बारां के देशभक्तों ने शहर के सरकारी भवनों पर तिरंगा फहराया और गिरफ्तारियां दीं।
  • राजस्थान एकीकरण (25 मार्च 1948): द्वितीय चरण (पूर्व राजस्थान संघ) में कोटा रियासत के साथ बारां क्षेत्र का राजस्थान में पूर्ण विलय हुआ।

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