मुख्य बिंदु: सवाई प्रताप सिंह (1764–1803 ई.) महाराजा सवाई प्रताप सिंह जयपुर के कछवाहा वंश के अत्यंत प्रभावशाली शासक, कला संरक्षक, कवि और कुशल योद्धा थे। वे जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के पौत्र और महाराजा माधोसिंह प्रथम के पुत्र थे। प्रमुख ऐतिहासिक परिचय शासनकाल: 1778 से 1803 ईस्वी (लगभग 25 वर्ष)। राज्याभिषेक: मात्र 14 […]
सवाई प्रताप सिंह (1764–1803 ई.)
महाराजा सवाई प्रताप सिंह जयपुर के कछवाहा वंश के अत्यंत प्रभावशाली शासक, कला संरक्षक, कवि और कुशल योद्धा थे। वे जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय के पौत्र और महाराजा माधोसिंह प्रथम के पुत्र थे।
प्रमुख ऐतिहासिक परिचय
-
शासनकाल: 1778 से 1803 ईस्वी (लगभग 25 वर्ष)।
-
राज्याभिषेक: मात्र 14 वर्ष की आयु में 1778 में जयपुर की गद्दी पर बैठे।
-
व्यक्तित्व: वे युद्धकला में जितने निपुण थे, साहित्य और कला के क्षेत्र में उतने ही संवेदनशील व पारखी थे।
प्रमुख निर्माण व सांस्कृतिक योगदान
-
हवा महल का निर्माण (1799): उनकी सबसे बड़ी पहचान जयपुर का विश्वप्रसिद्ध हवा महल है, जिसे उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट के आकार में बनवाया।
-
कवि ‘बृजनिधि’: वे भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे और ‘बृजनिधि’ उपनाम से ब्रजभाषा और ढूंढाड़ी में कविताएँ व पद लिखते थे। उनकी रचनाओं का संग्रह ‘बृजनिधि ग्रंथावली’ के नाम से जाना जाता है।
-
‘गुणीजन खाना’ (कला मंडल): उन्होंने अपने दरबार में विद्वानों, संगीतकारों, कवियों और चित्रकारों के लिए एक विशेष विभाग ‘गुणीजन खाना’ स्थापित किया।
-
राधा गोविंद संगीत सार: उन्होंने भारतभर के प्रसिद्ध संगीतज्ञों का एक विशाल सम्मेलन आयोजित करवाया और भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रामाणिक ग्रंथ ‘राधा गोविंद संगीत सार’ तैयार करवाया।
-
तमाशा लोकनाट्य: महाराष्ट्र की प्रसिद्ध लोकनाट्य शैली ‘तमाशा’ को जयपुर में संरक्षण देकर लोकप्रिय बनाने का श्रेय इन्हीं को जाता है (बंशीधर भट्ट के सहयोग से)।
सैन्य संघर्ष व प्रमुख युद्ध
उनका पूरा शासनकाल मराठों के बढ़ते दबाव और आंतरिक संघर्षों से जूझते हुए बीता:
-
तुंगा का युद्ध (1787): जयपुर और जोधपुर (राठौड़-कछवाहा गठबंधन) की संयुक्त सेना ने मराठा सेनापति महादजी सिंधिया की सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया।
-
पाटन का युद्ध (1790): मराठों (फ्रांसीसी जनरल डी बोइग्ने के नेतृत्व में) ने राजपूत सेना को हराया।
-
मालपुरा का युद्ध (1800): दौलतराव सिंधिया की मराठा सेना के साथ युद्ध हुआ।
-
ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि (1803): अपने शासनकाल के अंतिम समय में उन्होंने मराठों के निरंतर हमलों से सुरक्षा के लिए 1803 में अंग्रेजों (लॉर्ड लेक) के साथ पहली सहायक संधि की।
निधन
अगस्त 1803 में 39 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया। उनके बाद उनके पुत्र सवाई जगतसिंह द्वितीय जयपुर के शासक बने।
क्या आप सवाई प्रताप सिंह के समय लड़े गए तुंगा के युद्ध या उनकी काव्य रचनाओं (‘बृजनिधि ग्रंथावली’) के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं?