मुख्य बिंदु: बारां जिले (हाड़ौती अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य नामकरण: सोलंकी राजपूतों द्वारा 12 गाँवों को मिलाकर बसाए जाने के कारण इसका नाम ‘बारां’ पड़ा। उपनाम: सहरिया जनजाति की शरणस्थली, हाड़ौती का खजुराहो (भंडदेवरा), वराह नगरी। गठन: 10 अप्रैल 1991 को […]
बारां जिले (हाड़ौती अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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नामकरण: सोलंकी राजपूतों द्वारा 12 गाँवों को मिलाकर बसाए जाने के कारण इसका नाम ‘बारां’ पड़ा।
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उपनाम: सहरिया जनजाति की शरणस्थली, हाड़ौती का खजुराहो (भंडदेवरा), वराह नगरी।
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गठन: 10 अप्रैल 1991 को कोटा जिले से पृथक कर स्वतंत्र जिला बनाया गया।
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भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
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प्रमुख नदियाँ: परवन (अटरू व शेरगढ़ क्षेत्र), कालीसिंध (सीमा बनाती है), पार्वती, कुनू (सहरिया क्षेत्र), अंधेरी, ल्हासी, बिलास।
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रामगढ़ क्रेटर (Ramgarh Meteorite Crater, मांगरोल):
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लगभग 15 करोड़ वर्ष पूर्व उल्कापिंड गिरने से निर्मित 3.2 किमी व्यास वाला विहंगम गड्ढा (Meteorite Impact Crater)।
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यह राजस्थान का पहला और भारत का तीसरा भू-विरासत स्थल (Geo-Heritage Site) घोषित है।
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शाहबाद उच्च भूमि क्षेत्र: समुद्र तल से लगभग 450 मीटर ऊँचा पठारी भाग; इस क्षेत्र की सबसे ऊँची चोटी ‘कस्बाथाना’ (517 मी.) है।
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सिंचाई परियोजनाएं: ल्हासी परियोजना, विलास सिंचाई परियोजना, बेथली परियोजना, परवन वृहद् बहुउद्देश्यीय परियोजना।
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2. राजवंश एवं प्रमुख इतिहास
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शासक परंपरा: मध्यकाल में यह क्षेत्र हाड़ा चौहानों (कोटा रियासत) के अधीन रहा; इससे पूर्व खींची, परमार और गौड़ राजपूतों का शासन रहा।
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शेरशाह सूरी का प्रभाव: शेरशाह सूरी ने मालवा अभियान के समय कोशवर्धन दुर्ग को जीतकर उसका नाम ‘शेरगढ़’ रखा।
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मुकुटमणि देव (16वीं सदी): शाहबाद के प्रतापी शासक, जिन्होंने शाहबाद दुर्ग का निर्माण कराया।
3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
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काकोनी मंदिर समूह (छबड़ा/अटरू):
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परवन नदी के तट पर स्थित 8वीं से 12वीं शताब्दी के प्रतिहार व गुप्तोत्तर कालीन देवालयों के ध्वंसावशेष; इसे ‘मंदिरों की नगरी’ कहा जाता है।
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कपिलधारा (किशनगंज): प्राकृतिक जलप्रपात और महर्षि कपिल मुनि से संबंधित प्राचीन गुफाएँ व शैलाश्रय।
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गढ़पचड़ा एवं बिलासगढ़: प्राचीन ऐतिहासिक उजड़े हुए नगर (बिलासगढ़ को मुग़ल काल में नष्ट किया गया था)।
4. प्रमुख दुर्ग, मंदिर एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| शेरगढ़ दुर्ग (कोशवर्धन दुर्ग) | नागवंशीय शासक / जीर्णोद्धार: शेरशाह सूरी | परवन नदी के तट पर स्थित जल एवं गिरि दुर्ग; इसे प्राचीन काल में ‘कोशवर्धन’ कहा जाता था। इसमें ‘जालिम सिंह की हवेली’, बौद्ध विहार और मुग़ल कालीन स्मारक स्थित हैं। |
| शाहबाद दुर्ग | मुकुटमणि देव (1521 ई.) | भामती पहाड़ी पर स्थित कुंडलिया वन से घिरा अभेद्य किला; इसमें ‘नवलबाण तोप’ (19 फीट लंबी विशाल तोप) और ‘जामा मस्जिद’ (औरंगजेब द्वारा निर्मित) स्थित है। |
| नाहरगढ़ दुर्ग (किशनगंज) | स्थानीय जागीरदार | लाल पत्थर से निर्मित दिल्ली के लाल किले की शैली का सुंदर दुर्ग। |
| भंडदेवरा शिव मंदिर (रामगढ़) | मेद वंशीय राजा मलयवर्मा (10वीं सदी) | नागर शैली में निर्मित; मैथुनरत प्रतिमाओं के अंकन के कारण इसे ‘राजस्थान का मिनी खजुराहो’ और ‘हाड़ौती का खजुराहो’ कहा जाता है। |
| ब्राह्मणी माता मंदिर (सोरसन) | प्राकृतिक गुफा तीर्थ | विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर जहाँ देवी की पीठ (Back) का श्रृंगार व पूजा की जाती है और पीठ का ही भोग लगता है। |
| सीताबाड़ी (केलवाड़ा) | महर्षि वाल्मीकि आश्रम | वाल्मीकि आश्रम, लव-कुश जन्मस्थली, सीता कुटी तथा 5 प्राकृतिक शीतल जलकुंड (सीता कुंड, लक्ष्मण कुंड, सूरज कुंड आदि)। |
| अटरू का गढ़गच्छ मंदिर | 10वीं शताब्दी | बिना चूने के पत्थरों को जोड़कर निर्मित अद्भुत स्थापत्य। |
5. सहरिया जनजाति — संस्कृति व जीवनशैली
बारां जिले की किशनगंज और शाहबाद तहसील सहरिया जनजाति का मुख्य प्राकृतिक केंद्र है:
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एकमात्र आदिम जनजाति: भारत सरकार द्वारा राजस्थान की एकमात्र जनजाति जिसे ‘आदिम जनजाति समूह’ (PTG – Primitive Tribal Group) में शामिल किया गया है।
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सामाजिक शब्दावली:
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सहराना: सहरिया बस्ती।
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हथाई / बंगला: गाँव के बीच स्थित सामुदायिक बैठक स्थल।
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कोतवाल: सहरिया समाज का मुखिया।
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धारी संस्कार: मृत्यु के तीसरे दिन राख को देखकर पुनर्जन्म का अनुमान लगाने की अनूठी परंपरा।
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लोक नृत्य व देवता:
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शिकारी नृत्य: सहरिया पुरुषों द्वारा वेशभूषा पहनकर शिकार का अभिनय करते हुए किया जाने वाला वीर रस प्रधान नृत्य।
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इंद्रपरी, झेला व लहंगी नृत्य।
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आराध्य देव: तेजाजी महाराज एवं महर्षि वाल्मीकि (कुलगुरु); कुलदेवी: कोड़िया देवी।
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सीताबाड़ी का मेला (ज्येष्ठ अमावस्या): इसे ‘सहरिया जनजाति का कुंभ’ और ‘हाड़ौती अंचल का सबसे बड़ा मेला’ कहा जाता है।
6. कला, संस्कृति, हस्तशिल्प एवं मेले
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डोल मेला (श्रीजी का मेला, बारां):
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जलझूलनी (भाद्रपद शुक्ल एकादशी) के अवसर पर आयोजित 15 दिवसीय ऐतिहासिक मेला; इसमें विभिन्न अखाड़ों और श्रीजी की ‘डोल’ (विमान) यात्रा निकलती है।
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सोरसन का गधों का मेला: माघ शुक्ल सप्तमी को लगने वाला गधों और खच्चरों का राज्य स्तरीय व्यापार मेला।
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सोरसन घास मैदान (Sorsan Grasslands):
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विलुप्तप्राय राज्य पक्षी गोडावण (Great Indian Bustard) और कृष्णमृग (Blackbuck) का प्रमुख प्राकृतिक आवास।
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धनुष लीला (अटरू): भगवान राम द्वारा धनुष तोड़ने की ढाई सौ वर्ष पुरानी पारंपरिक लोक नाट्य परंपरा।
7. उद्योग, कृषि एवं ऊर्जा
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छबड़ा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट (मोतीपुरा, छबड़ा):
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राजस्थान का प्रमुख कोयला आधारित ताप विद्युत गृह (विशाल विद्युत उत्पादन क्षमता)।
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राजस्थान का पहला अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल पावर प्लांट।
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अंता गैस विद्युत गृह (NTPC):
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राजस्थान का प्रथम गैस आधारित विद्युत संयंत्र (केंद्र सरकार का उपक्रम)।
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लहसुन मंडी (छिपाबड़ौद):
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बारां राजस्थान में सर्वाधिक लहसुन उत्पादक जिला है; छिपाबड़ौद में राज्य की विशिष्ट लहसुन मंडी स्थित है।
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8. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रजामंडल आंदोलन
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कोटा प्रजामंडल का अभिन्न अंग: बारां पूर्व में कोटा रियासत की प्रमुख निजामत थी; अतः पं. नयनूराम शर्मा और अभिन्न हरि के नेतृत्व में हाड़ौती प्रजामंडल के आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा।
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1942 का भारत छोड़ो आंदोलन: बारां के देशभक्तों ने शहर के सरकारी भवनों पर तिरंगा फहराया और गिरफ्तारियां दीं।
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राजस्थान एकीकरण (25 मार्च 1948): द्वितीय चरण (पूर्व राजस्थान संघ) में कोटा रियासत के साथ बारां क्षेत्र का राजस्थान में पूर्ण विलय हुआ।