चित्तौड़गढ़ जिले के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
- उपनाम: राजस्थान का गौरव, किलों का सिरमौर, शक्ति व भक्ति की नगरी, बलिदान और शौर्य की पावन भूमि।
- प्राचीन नाम: मेदपाट, प्राग्वाट, सीवि जनपद (राजधानी: माध्यमिका/नगरी)।
- भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
- प्रमुख नदियाँ: बेड़च (आयड़), गंभीर/गंभीरी, बामनी (ब्राह्मणी), गुंजाली, बनास, वागन।
- पठार व जलप्रपात:
- मेसा का पठार: 616 मीटर ऊँचा पठार, जिस पर चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित है (गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम स्थल के समीप)।
- चूलिया जलप्रपात: भैंसरोड़गढ़ के निकट चंबल नदी पर स्थित राजस्थान का सबसे ऊँचा जलप्रपात (18 मीटर)।
- ओराई व बस्सी बांध: जिले के प्रमुख सिंचाई बांध।
- विशेष भौगोलिक क्षेत्र: चित्तौड़गढ़ जिला मुख्य रूप से दो खंडों में बंटा है (मुख्य चित्तौड़गढ़ एवं रावतभाटा/भैंसरोड़गढ़ क्षेत्र)।
2. राजवंश एवं प्रमुख शासक
- राजवंश: गुहिल/सिसोदिया राजवंश (चित्तौड़ मेवाड़ की प्राचीन राजधानी रहा)।
- कुलदेवी: बाण माता।
- आराध्य देव: भगवान एकलिंगनाथ जी व चारभुजा नाथ।
- प्रमुख शासक व उपलब्धियाँ:
- चित्रांगद मौर्य (7वीं सदी): दुर्ग के मूल निर्माता (प्रारंभिक नाम: चित्रकूट)।
- बप्पा रावल (कालभोज, 734 ई.): मान मोरी को पराजित कर चित्तौड़ पर गुहिल वंश का अधिकार स्थापित किया।
- रावल जैत्रसिंह (1213–1253 ई.): भूताला के युद्ध (1227 ई.) में इल्तुतमिश को पराजित किया; चित्तौड़ को मेवाड़ की पहली बार विधिवत राजधानी बनाया (जैत्रसिंह का काल मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल कहलाता है)।
- रावल रतनसिंह (1302–1303 ई.): गुहिल वंश की रावल शाखा के अंतिम शासक; अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध प्रथम साके का नेतृत्व किया। रानी पद्मिनी का ऐतिहासिक जौहर।
- राणा हम्मीर (1326–1364 ई.): सिसोदिया शाखा की स्थापना की; ‘मेवाड़ का उद्धारक’ और कुंभलगढ़ प्रशस्ति में ‘विषम घाटी पंचानन’ (विकट परिस्थितियों में सिंह के समान) कहा गया।
- महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.): सारंगपुर युद्ध (1437 ई.) विजय के उपलक्ष्य में विजय स्तंभ का निर्माण कराया; स्थापत्य और संगीत के महान संरक्षक।
- महाराणा सांगा (संग्राम सिंह, 1509–1528 ई.): खातौली, बाड़ी, गागरोन और बयाना/खानवा के युद्धों के नायक; शरीर पर 80 घाव होने के कारण ‘सैनिक भग्नावशेष’ कहलाए।
3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
- नगरी (प्राचीन नाम: माध्यमिका):
- बेड़च नदी के तट पर स्थित सीवि जनपद की राजधानी।
- 1904 में डॉ. डी.आर. भंडारकर द्वारा उत्खनन।
- यहाँ से वैष्णव/भागवत धर्म का सबसे प्राचीन अभिलेख ‘घोसुंडी शिलालेख’ (द्वितीय शताब्दी ई.पू.) प्राप्त हुआ (जिसमें गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ और संकर्षण-वासुदेव पूजा का उल्लेख है)।
4. चित्तौड़गढ़ दुर्ग एवं स्थापत्य
दुर्ग की उपाधि: “गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया।” यह राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट (Living Fort) और जल दुर्ग व गिरि दुर्ग की श्रेणी में आता है (आकार: व्हेल मछली के समान)।
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| विजय स्तंभ (कीर्ति स्तंभ) | महाराणा कुंभा (1440–1448 ई.) | 9 मंजिला (122 फीट ऊँचा, 157 सीढ़ियाँ); मालवा विजय (1437) के उपलक्ष्य में निर्मित। इसे ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश’ और ‘विष्णु ध्वज’ कहते हैं। राजस्थान पुलिस व माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिन्ह। तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी में ‘अल्लाह’ लिखा है। सूत्रधार: जैता, नापा, पोमा, पूंजा। |
| जैन कीर्ति स्तंभ | जीजाक बघेरवाल (12वीं सदी) | 7 मंजिला (75 फीट ऊँचा) स्मारक, जो प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है। |
| पद्मिनी महल | रावल रतनसिंह/पद्मिनी काल | कमल कुंड (जलाशय) के मध्य स्थित सुंदर ग्रीष्मकालीन महल; पास में जनाना व मर्दाना महल स्थित हैं। |
| कुंभश्याम मंदिर / मीरां मंदिर | महाराणा कुंभा | कुंभा द्वारा पंचायतन शैली में निर्मित विष्णु मंदिर; प्रांगण में मीराबाई का मंदिर व संत रैदास की छतरी स्थित है। |
| कालिका माता मंदिर | मूलतः मानभंग मौर्य (8वीं सदी) | मूल रूप से ‘सूर्य मंदिर’, जिसे बाद में महाराणा हम्मीर ने कालिका माता (दुर्गा) मंदिर में रूपांतरित किया। |
| सम्मत / समिद्धेश्वर मंदिर | परमार राजा भोज (11वीं सदी) | इसे ‘त्रिभुवन नारायण मंदिर’ या ‘भोज मंदिर’ भी कहा जाता है; महाराणा मोकल ने इसका जीर्णोद्धार कराया (अतः मोकल जी का मंदिर भी कहलाता है)। |
| सतबीस देवरी | 11वीं शताब्दी | 27 देवरियों (छोटे मंदिरों) वाला भव्य श्वेतांबर जैन मंदिर समूह। |
| भैंसरोड़गढ़ दुर्ग | भैंसा साह व रोड़ा चारण | चंबल व बामनी नदी के संगम पर स्थित जल दुर्ग; इसे ‘राजस्थान का वेल्लोर’ कहा जाता है। |
5. चित्तौड़गढ़ के ऐतिहासिक तीन साके (3 Sakas)
चित्तौड़गढ़ का इतिहास 3 गौरवशाली साकों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है:
- प्रथम साका (1303 ई.):
- आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी।
- शासक / सेनापति: रावल रतनसिंह (सेनापति: गोरा व बादल)।
- जौहर: रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 1600 वीरांगनाओं ने अग्नि जौहर किया (राजस्थान का सबसे बड़ा जौहर)। खिलजी ने चित्तौड़ का नाम बदलकर ‘खिज्राबाद’ रखा।
- द्वितीय साका (1534-35 ई.):
- आक्रमणकारी: गुजरात का सुल्तान बहादुरशाह।
- शासक / सेनापति: अल्पवयस्क विक्रमादित्य (केसरिया का नेतृत्व: देवलिया के रावत बाघ सिंह ने किया – पाडन पोल पर इनकी छतरी है)।
- जौहर: महाराणा सांगा की हाड़ी रानी कर्मवती (कर्णावती) के नेतृत्व में। (कर्मवती ने मुग़ल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता मांगी थी)।
- तृतीय साका (1567-68 ई.):
- आक्रमणकारी: मुग़ल सम्राट अकबर।
- शासक / सेनापति: महाराणा उदयसिंह (केसरिया का नेतृत्व: जयमल मेड़तिया, पत्ता चूंडावत एवं कल्ला जी राठौड़ ने किया)।
- जौहर: पत्ता चूंडावत की पत्नी रानी फूलकंवर के नेतृत्व में। अकबर ने दुर्ग जीतने के बाद 30,000 निर्दोष नागरिकों के कत्लेआम का आदेश दिया था।
6. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं भक्ति परंपरा
- लोकदेवता वीर कल्ला जी राठौड़ (चार हाथों वाले देवता):
- 1568 के साके में अकबर के विरुद्ध लड़ते हुए घायल जयमल को अपने कंधों पर बैठाकर युद्ध किया। चित्तौड़गढ़ के भैरव पोल और हनुमान पोल के बीच इनकी छतरी स्थित है।
- भक्त शिरोमणि मीराबाई:
- चित्तौड़ के भोजराज (राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र) की पत्नी; कृष्ण भक्ति (माधुर्य भाव) की अनन्य संत।
- इनके गुरु संत रैदास (रविदास) थे, जिनकी 4 खंभों की छतरी चित्तौड़ दुर्ग में मीरां मंदिर के सामने बनी है।
- सांवलिया सेठ मंदिर (मंडफिया):
- ‘सांवलिया जी’ (श्रीकृष्ण) का भव्य धाम; व्यापारियों व अफीम उत्पादकों द्वारा इन्हें व्यापार में ‘साझेदार/पार्टनर’ मानकर चढ़ावा चढ़ाने की अनूठी परंपरा है।
- मातृकुण्डिया तीर्थ (राशमी):
- चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित; इसे ‘राजस्थान का हरिद्वार’ कहा जाता है (यहाँ लक्ष्मण झूला व परशुराम कुंड स्थित है)।
- आसावरा माता मंदिर (भादसोड़ा):
- लकवाग्रस्त (Paralysis) रोगियों के इलाज हेतु प्रसिद्ध शक्तिपीठ।
7. कला, संस्कृति एवं हस्तशिल्प
- बस्सी की काष्ठ कला (Woodcraft):
- प्रभात जी सुथार द्वारा शुरू की गई 400 वर्ष पुरानी परंपरा; यहाँ की कावड़ (चल मंदिर), बेवाण (देव विमान) और गणगौर-ईसर की काष्ठ प्रतिमाएं विश्व प्रसिद्ध हैं।
- अकोला की दाबू प्रिंट (छीपा प्रिंट):
- बेड़च नदी के किनारे स्थित अकोला गाँव ‘जाजम/दाबू प्रिंट’ (फेंटिया) हेतु प्रसिद्ध है। यहाँ मिट्टी व गोंद के दाबू का प्रयोग होता है।
- जौहर मेला: चित्तौड़गढ़ दुर्ग में प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण एकादशी को वीरांगनाओं के बलिदान की स्मृति में भरता है।
8. प्रमुख साहित्यकार, विद्वान एवं संस्थान
- कवि अत्रि व महेश: विजय स्तंभ की ‘कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति’ के रचयिता।
- मंडन (कुंभा के प्रधान वास्तुकार): ग्रंथ: प्रसाद मंडन, राजवल्लभ, देवमूर्ति प्रकरण, रूप मंडन (मूर्तिकला)।
- नाथा (मंडन का भाई): ग्रंथ: वास्तुमंजरी।
- गोविंद (मंडन का पुत्र): ग्रंथ: उद्धार धोरिणी, कला निधि, द्वार दीपिका।
- रावतभाटा परमाणु बिजली घर (RAPP):
- 1973 में कनाडा के सहयोग से स्थापित भारत का दूसरा और राजस्थान का प्रथम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (भारी जल आधारित)।
9. स्वतंत्रता संग्राम, किसान आंदोलन एवं जननायक
- बिजौलिया किसान आंदोलन से निकटता: बिजौलिया पूर्व में मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था, जिसके प्रभाव से बेंगू का आंदोलन उपजा।
- बेंगू किसान आंदोलन (1921–1925 ई.):
- शुरुआत: 1921 में मेनाल (भैरवकुंड) से; नेतृत्व: रामनारायण चौधरी व विजय सिंह पथिक।
- जागीरदार अनूप सिंह और किसानों के मध्य हुए समझौते को मेवाड़ सरकार ने ‘बोल्शेविक समझौता’ कहकर रद्द कर दिया।
- गोविंदपुरा हत्याकांड (13 जुलाई 1923): मिस्टर ट्रेंच द्वारा गोलियां चलाने पर रूपाजी व कृपाजी धाकड़ शहीद हुए।
- एकी आंदोलन की शुरुआत (1921):
- मोतीलाल तेजावत ने वैशाख पूर्णिमा को मातृकुण्डिया (राशमी) के मेले से ऐतिहासिक एकी (भील) आंदोलन का शंखनाद किया था।
- माणिक्यलाल वर्मा का कार्यक्षेत्र: मेवाड़ प्रजामंडल के दौरान भूमिगत रहकर किसानों व आदिवासियों को एकजुट किया।