मुख्य बिंदु: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य प्राचीन नाम: जांगल प्रदेश (महाभारत काल), रातीघाटी। उपनाम: ऊंटों का देश (Camel Country), जांगलधर देश। स्थापना: 1488 ई. में राव बीका द्वारा (वैशाख शुक्ल तृतीया / आखा तीज के दिन)। भौगोलिक स्थिति व नदियाँ: बीकानेर जिले में कोई भी बारहमासी नदी प्रवाहित नहीं होती (चूरू के साथ यह बिना किसी […]
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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प्राचीन नाम: जांगल प्रदेश (महाभारत काल), रातीघाटी।
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उपनाम: ऊंटों का देश (Camel Country), जांगलधर देश।
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स्थापना: 1488 ई. में राव बीका द्वारा (वैशाख शुक्ल तृतीया / आखा तीज के दिन)।
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भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
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बीकानेर जिले में कोई भी बारहमासी नदी प्रवाहित नहीं होती (चूरू के साथ यह बिना किसी आंतरिक नदी वाला जिला रहा है)।
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झीलें व जलस्रोत: कोलायत झील (प्राकृतिक मीठे पानी की झील; कपिल मुनि की तपोभूमि), गजनेर झील (इसे “पानी का शुद्ध दर्पण” कहा जाता है), अनूप सागर, सूरसागर।
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नहर प्रणाली: गंग नहर (1927 ई. में महाराजा गंगासिंह द्वारा लाई गई राजस्थान की पहली नहर प्रणाली), इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) का प्रमुख लाभार्थी क्षेत्र।
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2. राजवंश एवं प्रमुख शासक
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राजवंश: राठौड़ वंश (जोधपुर के राव जोधा के पुत्र राव बीका द्वारा स्थापित स्वतंत्र शाखा)।
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कुलदेवी: करणी माता (देशनोक) एवं नागणेची माता।
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उपाधि: बीकानेर के शासक स्वयं को ‘जांगलधर बादशाह’ कहते थे।
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प्रमुख शासक व उपलब्धियाँ:
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राव बीका (1465–1504 ई.): बीकानेर राज्य व नगर के संस्थापक।
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राव लूणकरण (1505–1526 ई.): अत्यधिक दानवीरता के कारण बिठू सूजा ने ‘छंद राउ जईतसी रउ’ में इन्हें ‘कलिकाल का कर्ण’ कहा। लूणकरणसर झील की स्थापना की।
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राव जैतसी: 1534 ई. में बाबर के पुत्र कामरान को पराजित किया (रातिघाटी का युद्ध)।
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राव कल्याणमल: 1570 के नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले बीकानेर के प्रथम शासक।
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महाराजा रायसिंह (1571–1612 ई.): मुग़ल साम्राज्य का प्रमुख स्तंभ; अकबर व जहाँगीर के विश्वासपात्र; मुंशी देवी प्रसाद ने इन्हें ‘राजपूताने का कर्ण’ कहा। जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण कराया।
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महाराजा अनूप सिंह (1669–1698 ई.): दक्षिण भारत के अभियानों में अद्वितीय योगदान; औरंगजेब ने ‘माही भरातिव’ की उपाधि दी। इनके काल में ‘अनूप संस्कृत पुस्तकालय’ बना और बीकानेर चित्रकला का स्वर्णकाल आया।
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महाराजा गंगासिंह (1887–1943 ई.): ‘आधुनिक भारत/राजस्थान का भागीरथ’; तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया; 1927 में गंग नहर का निर्माण; ‘गंगा रिसाला’ (ऊंटों की प्रसिद्ध सेना) के माध्यम से प्रथम विश्व युद्ध में सेवाएँ दीं; 1921 में ‘नरेंद्र मंडल’ (Chamber of Princes) के प्रथम चांसलर बने।
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3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
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सांवलिया/सोथी सभ्यता: बीकानेर में स्थित प्राक-हड़प्पा कालीन सभ्यता स्थल, जिसे अमलानंद घोष ने ‘कालीबंगा प्रथम’ नाम दिया।
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पुगल: ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग का प्राचीन केंद्र, जो ढोला-मारू प्रेमाख्यान (मारू/मारवणी का जन्मस्थान) से भी जुड़ा है।
4. प्रमुख दुर्ग, महल एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| जूनागढ़ दुर्ग | महाराजा रायसिंह (1589–1594 ई.) | लाल बलुआ पत्थर से निर्मित; इसे ‘जमीन का जेवर’ और ‘रातीघाटी का किला’ कहा जाता है। वास्तुकार: कर्मचंद। इसके सूरज पोल पर जयमल मेड़तिया और पत्ता चूंडावत की गजारूढ़ मूर्तियाँ स्थापित हैं। |
| लालगढ़ पैलेस | महाराजा गंगासिंह | पिता महाराजा लालसिंह की स्मृति में लाल पत्थरों से निर्मित यूरोपीय व राजपूत शैली का भव्य महल (वास्तुकार: सर स्विंटन जैकब)। |
| गजनेर पैलेस | महाराजा गंगासिंह | गजनेर झील के किनारे स्थित ‘शाही शिकारगाह’ (शिकार लॉज); यहाँ रेत का तीतर (बड़बड़ पक्षी / Imperial Sandgrouse) पाया जाता है। |
| भांडाशाह जैन मंदिर | सेठ भांडाशाह ओसवाल (15वीं सदी) | भगवान सुमतिनाथ को समर्पित 3 मंजिला मंदिर; मान्यता है कि इसके निर्माण की नींव में पानी की जगह घी का प्रयोग किया गया था। |
| बीकानेर की हवेलियाँ | रामपुरिया, बच्छावतों की हवेलियाँ | लाल पत्थर की बारीक नक्काशी, झरोखों और ‘पटवों’ जैसी जालीदार कारीगरी हेतु विश्व प्रसिद्ध। |
| देविकुंड की छतरियाँ | बीकानेर राजपरिवार | बीकानेर के शासकों व रानियों की भव्य संगमरमर व छतरियाँ। |
5. प्रमुख ऐतिहासिक युद्ध एवं घटनाएँ
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रातीघाटी का युद्ध (1534 ई.): राव जैतसी ने कामरान (हुमायूँ का भाई) को पराजित किया।
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पाहेबा/साहेबा का युद्ध (1541-42 ई.): मारवाड़ के राव मालदेव और बीकानेर के राव जैतसी के बीच; जैतसी वीरगति को प्राप्त हुए और बीकानेर पर मालदेव का अधिकार हुआ।
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मतीरे की राड़ (1644 ई.): सीमा पर मतीरे (तरबूज) की बेल को लेकर बीकानेर के राजा कर्णसिंह और नागौर के राजा अमरसिंह राठौड़ के बीच हुआ प्रसिद्ध युद्ध।
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कांगड़ा अभियान: रायसिंह द्वारा मुग़ल सेवा में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका।
6. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं संप्रदाय
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करणी माता (देशनोक):
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राठौड़ राजवंश व चारणों की कुलदेवी; ‘चूहों वाली देवी’ (सफेद चूहे को ‘काबा’ कहा जाता है, जिसका दिखना शुभ माना जाता है)।
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मेहरानगढ़ (जोधपुर) और बीकानेर दुर्ग की नींव करणी माता के आशीर्वाद से रखी गई थी।
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जंभोजी (विश्नोई संप्रदाय):
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समाधि स्थल: मुकाम (तालवा, नोखा); 29 नियमों का प्रतिपादन किया।
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लालासर (निर्वाण स्थल) और जांगलू बीकानेर जिले के प्रमुख विश्नोई तीर्थ हैं।
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जसनाथ जी (जसनाथी संप्रदाय):
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मुख्य पीठ: कतरियासर (बीकानेर)। 36 नियमों का पालन।
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अग्नि नृत्य: जसनाथी संप्रदाय के सिद्ध पुरुषों द्वारा धधकते अंगारों पर ‘फ़तेह-फ़तेह’ के घोष के साथ किया जाने वाला अनूठा नृत्य।
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कपिल मुनि का आश्रम (कोलायत):
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सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल की तपोभूमि; यहाँ कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है जहाँ दीपदान परंपरा प्रसिद्ध है।
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हेरंब गणपति मंदिर (जूनागढ़): सिंह (शेर) पर सवार गणेश जी की दुर्लभ प्रतिमा।
7. कला, संस्कृति एवं हस्तशिल्प
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बीकानेर चित्रकला शैली:
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स्वर्णकाल: महाराजा अनूप सिंह का शासनकाल।
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विशेषताएँ: मुग़ल व दक्षिण भारतीय प्रभाव, चित्रकार चित्र पर अपना नाम व तिथि (संवत) अंकित करते थे।
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प्रमुख चित्रकार: रुकनुद्दीन, अलीराजा, हामिद, ईसा।
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उस्ता कला (मुनव्वती कला):
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ऊंट की खाल पर सोने की बारीक मीनाकारी और नक्काशी करने की कला।
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इसे लाहौर से महाराजा रायसिंह के समय लाया गया। प्रमुख कलाकार: पद्मश्री हिसामुद्दीन उस्ता।
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प्रशिक्षण केंद्र: कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर (बीकानेर)।
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मथेरण कला:
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जैन मथेरण समुदाय द्वारा चूने व रंगों से दीवारों पर धार्मिक भित्तिचित्र एवं काष्ठ पर कलाकृतियाँ बनाना।
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बीकानेरी भुजिया व रसगुल्ले: विश्व प्रसिद्ध स्वाद; बीकानेरी भुजिया को जीआई (GI) टैग प्राप्त है (महाराजा डूंगरसिंह के समय शुरुआत)।
8. प्रमुख साहित्यकार, विद्वान एवं संस्थान
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पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल): राव कल्याणमल के पुत्र; अकबर के नवरत्नों में शामिल; प्रसिद्ध डिंगल ग्रंथ ‘वेलि क्रिसन रुकमणी री’ के रचयिता (दुर्सा आढ़ा ने इस ग्रंथ को ‘5वां वेद व 19वां पुराण’ कहा है)।
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बिठू सूजा: ग्रंथ: छंद राउ जईतसी रउ।
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दलपत सिंह: ग्रंथ: दलपत विलास।
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एल.पी. तेस्सीतोरी (डॉ. लुइगी पियो तेस्सीतोरी): इटली के भाषाविद, जिन्होंने बीकानेर में रहकर चारण साहित्य और राजस्थानी बोलियों पर व्यापक शोध किया। इनकी छतरी बीकानेर में स्थित है।
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प्रमुख शोध केंद्र:
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राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (NRCC), जोड़बीड़ (1984)।
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केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान (CIAH), बीछवाल।
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9. स्वतंत्रता संग्राम, किसान आंदोलन एवं प्रजामंडल
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बीकानेर प्रजामंडल (1936 ई.):
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स्थापना: 4 अक्टूबर 1936 को मघाराम वैद्य, लक्ष्मणदास स्वामी आदि द्वारा कलकत्ता (अब कोलकाता) में की गई (राजस्थान से बाहर स्थापित प्रजामंडल)।
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सर्वहितकारिणी सभा (1907 ई., चूरू/बीकानेर रियासत): स्वामी गोपालदास व कन्हैयालाल ढूंढ द्वारा स्थापित; इन्होंने बालिकाओं हेतु ‘पुत्री पाठशाला’ और दलितों हेतु ‘कबीर पाठशाला’ खोली।
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बीकानेर षड्यंत्र केस (1932 ई.): गंगासिंह के गोलमेज सम्मेलन में जाने के समय ‘बीकानेर दिग्दर्शन’ पुस्तिका बांटने के कारण स्वामी गोपालदास, चंदनमल बहड़ आदि पर मुकदमा चलाया गया।
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दूधवा खारा व कांगड़ किसान आंदोलन: बीकानेर रियासत के प्रमुख किसान संघर्ष (नेता: हनुमान सिंह आर्य, खेताराम, मघाराम वैद्य)।
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बीरबल सिंह ढालिया: रायसिंहनगर में तिरंगा फहराते हुए 1946 में शहीद हुए (17 जुलाई को ‘बीरबल दिवस’ मनाया गया)।