मुख्य बिंदु: जोधपुर जिले (मारवाड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य उपनाम: सूर्यनगरी (Sun City), ब्लू सिटी (Blue City / नीली नगरी), मारवाड़ की राजधानी, राजस्थान की सांस्कृतिक व विधिक राजधानी (High Court Seat)। स्थापना: 12 मई 1459 (ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी, वि.सं. 1515) […]
जोधपुर जिले (मारवाड़ अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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उपनाम: सूर्यनगरी (Sun City), ब्लू सिटी (Blue City / नीली नगरी), मारवाड़ की राजधानी, राजस्थान की सांस्कृतिक व विधिक राजधानी (High Court Seat)।
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स्थापना: 12 मई 1459 (ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी, वि.सं. 1515) को राठौड़ शासक राव जोधा द्वारा जोधपुर नगर की स्थापना की गई।
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भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
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नदियाँ: लूनी नदी (मरुगंगा – पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख नदी), जोजरी (नागौर से निकलकर जोधपुर में लूनी में मिलने वाली एकमात्र गैर-अरावली सहायक नदी)।
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झीलें व जलस्रोत:
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बालसमंद झील: 1159 ई. में बालकराव परिहार द्वारा निर्मित।
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कायलाना झील (सर प्रताप सागर): प्रताप सिंह द्वारा निर्मित मीठे पानी की कृत्रिम झील।
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उम्मेद सागर, गुलाब सागर, पदमसर तालाब ও रानीसर तालाब।
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पहाड़ियाँ: चिड़ियाटूँक पहाड़ी (जिस पर मेहरानगढ़ बना है), मसूरिया पहाड़ी।
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रेगिस्तानी अनुसंधान संस्थान:
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CAZRI (केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, 1959)।
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AFRI (शुष्क वन अनुसंधान संस्थान, 1988)।
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2. राजवंश एवं प्रमुख शासक
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राजवंश: राठौड़ राजवंश (मूल पुरुष: राव सीहा – 13वीं सदी; कन्नौज के जयचंद गहड़वाल के वंशज)।
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कुलदेवी: नागणेची माता (18 भुजाओं वाली देवी); इष्टदेवी: चामुंडा माता।
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प्रमुख शासक व योगदान:
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राव चूड़ा: मंडोर को दहेज (इंदा प्रतिहारों से) में प्राप्त कर राठौड़ों की पहली स्थायी राजधानी बनाया।
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राव जोधा (1438–1489 ई.): 1453 में ‘आंवल-बांवल की संधि’ (राणा कुंभा से) की; 1459 में जोधपुर बसाया और मेहरानगढ़ दुर्ग बनवाया।
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राव मालदेव (1531–1562 ई.): 52 युद्धों व 58 परगनों का विजेता; फारसी इतिहासकारों ने ‘हशमत वाला राजा’ (वैभवशाली शासक) कहा; पत्नी: उमादे (रूठी रानी)।
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राव चंद्रसेन (1562–1581 ई.): ‘मारवाड़ का प्रताप’, ‘महाराणा प्रताप का अग्रगामी/पथ-प्रदर्शक’, ‘भूला-बिसरा राजा’ (The Forgotten Hero of Marwar); मुग़ल सम्राट अकबर की कभी अधीनता स्वीकार नहीं की।
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महाराजा जसवंत सिंह प्रथम: मुग़ल दरबार के प्रमुख मनसबदार; दरबारी विद्वान मुहणौत नैणसी (‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ व ‘नैणसी री ख्यात’ के रचयिता – मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को ‘राजपूताने का अबुल फजल’ कहा)।
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वीर दुर्गादास राठौड़ (‘मारवाड़ का अणबिंदिया मोती’ / ‘राठौड़ों का यूलीसेस’): अजीत सिंह को औरंगजेब के चंगुल से छुड़ाकर 30 वर्षों तक मुग़लों से अनवरत संघर्ष किया।
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महाराजा मानसिंह (1803–1843 ई.): ‘सन्यासी राजा’; नाथ संप्रदाय के अनुयायी (महामंदिर का निर्माण कराया); 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की।
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महाराजा उम्मेद सिंह: अकाल राहत कार्य हेतु विश्व के सबसे बड़े रिहायशी महलों में से एक ‘उम्मेद भवन पैलेस’ (छीतर पैलेस) का निर्माण कराया।
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महाराजा हनवंत सिंह: स्वतंत्रता व एकीकरण के समय जोधपुर के अंतिम शासक (जो प्रारंभ में पाकिस्तान में मिलने के इच्छुक थे, बाद में भारत में विलय पर हस्ताक्षर किए)।
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3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
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मंडोर (प्राचीन नाम: मांडव्यपुर):
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6ठी से 14वीं शताब्दी तक गुर्जर-प्रतिहारों की प्रारंभिक राजधानी।
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रावण की पत्नी मंदोदरी की जन्मस्थली (रावण की चंवरी स्थित है; यहाँ रावण का दहन नहीं किया जाता)।
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जोधपुर के महाराजाओं के भव्य देवल (छतरियाँ) और 33 करोड़ देवी-देवताओं की साल (Hall of Heroes) यहीं स्थित हैं।
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ओसियां (प्राचीन नाम: उपकेशपट्टन):
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8वीं-12वीं शताब्दी का ‘राजस्थान का भुवनेश्वर’; गुर्जर-प्रतिहार कालीन महा-मारू शैली के 16 से अधिक हिंदू व जैन मंदिर (सूर्य मंदिर, हरिहर मंदिर व सच्चियाय माता मंदिर – ओसवाल जैन समाज की कुलदेवी)।
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4. प्रमुख दुर्ग, महल एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| मेहरानगढ़ दुर्ग | राव जोधा (1459 ई.) | चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर मोर की आकृति में निर्मित गिरि दुर्ग; इसे ‘मयूरध्वजगढ़’, ‘गढ़ चिंतामणि’ व ‘सूर्यगढ़’ कहा जाता है। नींव में राजाराम (रझिया) कड़ेला (मेघवाल) को जीवित गाड़ा गया था। रुडयार्ड किपलिंग ने कहा: “इसका निर्माण परियों और फरिश्तों ने किया है।” इसमें मोती महल, फूल महल, शृंगार चौकी (जहाँ राजाओं का राजतिलक होता था) और किलकिला, शंभूबाण, गजनी खां तोपें स्थित हैं। |
| जसवंत थड़ा | महाराजा सरदार सिंह (1906 ई.) | महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में सफेद मकराना संगमरमर से निर्मित स्मारक; इसे ‘राजस्थान का ताजमहल’ कहा जाता है। |
| उम्मेद भवन पैलेस (छीतर पैलेस) | महाराजा उम्मेद सिंह (1928–1943) | छीतर (बलुआ) पत्थर से निर्मित इंडो-डेको/यूरोपीय शैली का विशाल राजमहल; वास्तुकार: हेनरी वॉन लैनचेस्टर। |
| महामंदिर | महाराजा मानसिंह (1812 ई.) | नाथ संप्रदाय (आयस देवनाथ) की भारत में प्रमुख पीठ; 84 खंभों पर टिका भव्य स्थापत्य। |
| खेजड़ली स्मारक | पर्यावरण तीर्थ | 1730 ई. के अमर विश्नोई बलिदान का स्मृति स्थल। |
| एक थंभा महल (मंडोर) | महाराजा अजीत सिंह | मंडोर में स्थित एक ही विशाल स्तंभ पर आधारित ऐतिहासिक महल। |
5. प्रमुख ऐतिहासिक युद्ध एवं घटनाएँ
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गिरी-सुमेल का युद्ध (5 जनवरी 1544 ई.): राव मालदेव (जैता-कूंपा) बनाम शेरशाह सूरी।
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धर्मत का युद्ध (1658 ई., म.प्र.): जसवंत सिंह प्रथम ने दारा शिकोह की ओर से औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध लड़ा (हारने पर रानी जसवंतदे ने किले के दरवाजे बंद कर लिए थे)।
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गिंगोली का युद्ध (1807 ई., परबतसर): मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी से विवाह को लेकर जोधपुर के मानसिंह और जयपुर के जगतसिंह द्वितीय के मध्य।
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खेजड़ली का अमर बलिदान (12 सितंबर 1730 ई. – भाद्रपद शुक्ल दशमी):
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महाराजा अभयसिंह के काल में दीवान गिरधारीदास द्वारा खेजड़ी के वृक्ष कटवाने के विरोध में।
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अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 विश्नोई नर-नारियों ने पेड़ों से चिपककर (चिपको आंदोलन) अपने शीश कटवा दिए।
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विश्व का एकमात्र ‘वृक्ष मेला’ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को खेजड़ली गाँव में भरता है।
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6. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं संप्रदाय
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लोकदेवता पाबूजी महाराज (कोलू मंड, फलोदी/जोधपुर):
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‘ऊंटों के देवता’ (प्लेग रक्षक देवता); रायका/रेबारी जाति के आराध्य; पाबूजी की फड़ राजस्थान में सर्वाधिक लोकप्रिय फड़ है (रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ)।
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लोकदेवता हड़बूजी सांखला (बैंगटी):
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रामदेव जी के मौसेरे भाई; शकुन शास्त्र के ज्ञाता; इनके मंदिर में इनकी ‘बैलगाड़ी’ (छकड़ा गाड़ी) की पूजा होती है।
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सच्चियाय माता मंदिर (ओसियां): ओसवाल समाज की कुलदेवी।
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चामुंडा माता मंदिर (मेहरानगढ़): राव जोधा द्वारा स्थापित; 30 सितंबर 2008 को नवरात्र में यहाँ भगदड़ मची थी (जांच आयोग: जस्टिस जसराज चोपड़ा कमेटी)।
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धींगा गवर बेतमार मेला (Dhinga Gavar): वैशाख कृष्ण तृतीया को जोधपुर में आयोजित अनूठा उत्सव, जिसमें महिलाएं सज-धजकर रात में लाठी (बेंत) से पुरुषों को मारती हैं।
7. कला, संस्कृति एवं हस्तशिल्प
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जोधपुर चित्रकला शैली (मारवाड़ शैली):
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स्वर्णकाल: राव मालदेव व महाराजा मानसिंह का काल (नाथ संप्रदाय का गहरा प्रभाव)।
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प्रमुख रंग: पीला (Yellow) व लाल; ढोला-मारू, मूमल-महेंद्रा, बारहमासा और शिकार के दृश्य।
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प्रसिद्ध चित्रकार: शिवदास, अमरदास, भाटी विशनदास, छज्जू, जीतमल।
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बादला उद्योग (Badla Craft):
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जिंक (जस्ते) से निर्मित पानी की बोतलें/पात्र जिन पर कपड़े या चमड़े की परत चढ़ाई जाती है, जिससे पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है।
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जोधपुरी बंधेज व साफा: जोधपुरी साफा (पगड़ी) और मोठड़ा/बंधेज पूरे विश्व में विख्यात हैं।
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मथानिया की लाल मिर्च: मथानिया (जोधपुर) की तीखी लाल मिर्च।
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खान-पान संस्कृति: जोधपुरी मावा कचौरी, प्याज की कचौरी, मिर्ची बड़ा और गुलाब जामुन।
8. स्वतंत्रता संग्राम, प्रजामंडल एवं जन आंदोलन
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मारवाड़ सेवा संघ (1920) व मारवाड़ हितकारिणी सभा (1918/1923):
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संस्थापक: जयनारायण व्यास (‘शेर-ए-राजस्थान’, ‘लोकनायक’, ‘लक्कड़ और कक्कड़’) एवं आनंदराज सुराणा।
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मारवाड़ प्रजामंडल (1934 ई.):
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संस्थापक: जयनारायण व्यास, भंवरलाल सर्राफ (प्रथम अध्यक्ष) और अभयमल जैन।
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बालमुकुंद बिस्सा (राजस्थान के जतिन दास):
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जोधपुर जेल में राजनीतिक बंदियों के अधिकारों हेतु भूख हड़ताल करते हुए 19 जून 1942 को शहीद हुए।
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डाबड़ा कांड (13 मार्च 1947, डीडवाना/मारवाड़): मोतीराम, चुन्नीलाल आदि किसानों पर जागीरदारों द्वारा गोलियां चलाई गईं।
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महिला नेतृत्व: महिमा देवी किंकर, कृष्णा कुमारी व सावित्री देवी भाटी।
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राजस्थान एकीकरण (30 मार्च 1949): चतुर्थ चरण (वृहत् राजस्थान) में जोधपुर रियासत का राजस्थान में विलय हुआ।