मुख्य बिंदु: प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे RPSC, RSMSSB आदि) की दृष्टि से राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति और उसके क्रमिक विकास का प्रामाणिक विवरण राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और वरिष्ठ भाषाविदों के शोध ग्रंथों पर आधारित है: 1. राजस्थानी भाषा का उद्भव और काल-निर्धारण प्राचीन रूप: प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के विकास क्रम से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का […]
प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे RPSC, RSMSSB आदि) की दृष्टि से राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति और उसके क्रमिक विकास का प्रामाणिक विवरण राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और वरिष्ठ भाषाविदों के शोध ग्रंथों पर आधारित है:
1. राजस्थानी भाषा का उद्भव और काल-निर्धारण
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प्राचीन रूप: प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के विकास क्रम से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का जन्म हुआ है। राजस्थानी भाषा का प्रारंभिक रूप ‘मरुभाषा’ या ‘मरु-गुर्जर’ के रूप में जाना जाता है।
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नामकरण: राजस्थानी भाषा के लिए ‘राजस्थानी’ शब्द का सबसे पहले वैज्ञानिक और व्यवस्थित प्रयोग प्रसिद्ध भाषाविद् जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (George A. Grierson) ने वर्ष 1912 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया’ (Linguistic Survey of India) में किया था।
2. उत्पत्ति के संबंध में प्रमुख विद्वानों के मत
राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति किस अपभ्रंश से हुई है, इस विषय में विभिन्न इतिहासकारों और भाषाविदों ने अपने अलग-अलग मत दिए हैं:
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डॉ. एल.पी. टेस्सीटोरी (Dr. L.P. Tessitori):
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इटली के प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. टेस्सीटोरी ने प्राचीन और चारण साहित्य का गहन अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट किया कि पश्चिमी राजस्थान की भाषा ‘गुर्जर अपभ्रंश’ (या मरु-गुर्जर अपभ्रंश) से विकसित हुई है, जो आगे चलकर राजस्थानी कहलाई।
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डॉ. मोतीलाल मेनारिया:
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डॉ. मेनारिया ने भी टेस्सीटोरी के मत का पूर्ण समर्थन करते हुए माना है कि राजस्थानी भाषा की जड़ें ‘गुर्जर अपभ्रंश’ से जुड़ी हुई हैं।
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के.एम. मुंशी (कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी):
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इन्होंने अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रचनाओं में इस भाषा के प्रारंभिक रूप को ‘गुर्जर अपभ्रंश’ माना है, जिससे गुजराती और राजस्थानी दोनों का निकट का संबंध बनता है।
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डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी:
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इनके अनुसार राजस्थानी भाषा का विकास ‘प्रतिहारी अपभ्रंश’ या शौरसेनी के एक विशिष्ट रूप से हुआ है।
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डॉ. दशरथ शर्मा:
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इन्होंने इसे शौरसेनी अपभ्रंश के प्रभाव क्षेत्र से विकसित माना है।
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3. राजस्थानी भाषा के विकास का काल-क्रम (Timeline)
भाषा-वैज्ञानिकों ने राजस्थानी भाषा के विकास को मुख्य रूप से चार चरणों में विभाजित किया है:
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प्राक्कलन काल / अपभ्रंश काल (लगभग 750 से 1000 ईस्वी):
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इस काल में प्राकृत और अपभ्रंश का प्रभाव कम होने लगा तथा स्थानीय बोलियों के मिलने से मरु-गुर्जर अपभ्रंश का आधार तैयार हुआ।
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प्राचीन राजस्थानी काल (लगभग 1000 से 1500 ईस्वी):
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इस काल में भाषा ने अपना एक स्वतंत्र रूप लेना शुरू कर दिया था। जैन साहित्य (जैसे भरतेश्वर बाहुबली रास) और प्रारंभिक चारण काव्य इसी काल की देन हैं।
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मध्यकालीन राजस्थानी काल (लगभग 1500 से 1850 ईस्वी):
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यह राजस्थानी भाषा का स्वर्णकाल माना जाता है। इस काल में भाषा की दो प्रमुख साहित्यिक शैलियों का विकास हुआ—
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डिंगल: यह पश्चिमी राजस्थानी (मुख्यतः मारवाड़ी) का साहित्यिक रूप था, जिसमें चारण कवियों ने वीर रस की रचनाएँ (जैसे ख्यात, बात, वचनिका और गीत) लिखीं।
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पिंगल: यह पूर्वी राजस्थानी (जो ब्रज भाषा से प्रभावित थी) का साहित्यिक रूप था।
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आधुनिक राजस्थानी काल (1851 ईस्वी से वर्तमान तक):
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इस काल में राजस्थानी भाषा ने गद्य, कहानी, उपन्यास, नाटक और आधुनिक कविता के रूप में व्यापक प्रगति की तथा लोक-साहित्य का संकलन शुरू हुआ।
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4. परीक्षा की दृष्टि से कुछ विशिष्ट और महत्वपूर्ण बिंदु
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ध्वनिगत विशेषताएँ: राजस्थानी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पुल्लिंग शब्द आकारन्त न होकर ओकारन्त होते हैं (जैसे— घोड़ा का ‘घोडो’, लड़का का ‘लड़को’)। इसके अलावा इसमें ‘ण’ और ‘ळ’ ध्वनियों का विशिष्ट और बहुतायत से प्रयोग होता है।
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बोलियाँ: जॉर्ज ग्रियर्सन और एल.पी. टेस्सीटोरी ने राजस्थानी की मुख्य बोलियों (जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, मालवी आदि) का वर्गीकरण करते हुए इसे पश्चिमी और पूर्वी राजस्थान के अंतर्गत विभाजित किया है।